फिल्म समीक्षा- 'pk' (पी.के.)


 फ़िल्म ‘pk’ एक एलियन (दूसरे ग्रह का प्राणी) के द्वारा अपने घर (ग्रह) वापस लौटने के लिए किये गए संघर्ष की कथा है। ‘pk’ (फ़िल्म का पात्र) एक ऐसे ग्रह से पृथ्वी पर आया था जहाँ न तो कोई भाषा थी न ही वहां के लोग अपने शरीर को ढकने के लिए वस्त्रों का प्रयोग करते थे, उस ग्रह पर लोग आपस में संकेतों के माध्यम से अपने विचारों का आदान-प्रदान करते थे अर्थात वहां की भाषा सांकेतिक थी। निर्देशक राजकुमार हिरानी जी ने pk पात्र के माध्यम से कुछ बुराइयों को उजागर किया है, जैसे pk जग्गू (अनुष्का शर्मा) से कहता है कि "हमरे गोले पर झूठ नाहीं बोलत हैं।" दुनियां में झूठ बोलना आम बात हो गयी है। इसी कारण जग्गू भी pk (आमिर खान) की दूसरे ग्रहवाली बातें सुनकर उसका यकीन नहीं करती है। अब जब pk को एलियन के रूप में दिखाना था तो उसके पास कोई न कोई शक्ति को भी दिखाना जाहिर सी बात थी जैसा कि अन्य फिल्मों में दिखाते हैं कि दूसरे ग्रह से आये प्राणी के पास कोई न कोई शक्ति ज़रूर होती है उसी प्रकार इस फ़िल्म में भी pk के पास एक ऐसी शक्ति है जिससे वह दूसरे मनुष्य के हाथ पकड़कर उसके मस्तिष्क में क्या चल रहा है यह पता आसानी से लगा लेता है यही नहीं एक वेश्या का हाथ पकड़कर पूरे 6 घंटे में वह उस वेश्या की पूरी भाषा अपने अंदर खींच लेता है। इत्तेफ़ाक़ से उस महिला की बोली भोजपूरी होती है। फ़िल्म में भोजपुरी का कमाल दर्शकों को खूब लुभाता है, पूरी फ़िल्म में आमिर खान भोजपुरी बोलते हुए दिखाई देते हैं।
        फ़िल्म की शुरुआत से ही निर्देशक ने पृथ्वी पर रहनेवाले लोगों की बुराइयाँ दिखाना शुरू कर दिया और ये पहली बुराई थी-चोरी। ‘pk’का पृथ्वी पर पहला क़दम रखते ही उसका वो संकेतक उसके गले से एक गाँव के व्यक्ति द्वारा छीनकर दिखाकर निर्देशक जी ने मनुष्य की पहली बुराई को उजागर कर दिया। उसके गले में पड़ा हुआ वो संकेतक जो उसके ग्रह में पृथ्वी पर उसके स्थान को संकेत करके बताता, तब उसका यान उसे वापस लेने के लिए पृथ्वी पर आता। संकेतक चोरी होने के बाद pk पूरी फ़िल्म में उसी संकेतक को ढूंढता हुआ नज़र आता है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कोई पक्षी अपना बसेरा भूलकर इधर-उधर घूमता रहता है। पृथ्वी पर आकर pk को कैसी-कैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, इसको निर्देशक साहब ने बड़े ही मनोरंजक ढंग से ठीक उसी प्रकार दिखाया है जिस प्रकार जब बच्चा जन्म लेता है तो उसे पृथ्वी के बारे में कुछ नहीं पता होता है और जैसे-जैसे वो बड़ा होता रहता है अपने से बड़ों का अनुकरण करके वो सारी चीज़ें सीखता रहता है ठीक वही स्थिति थी pk की, जिसे पृथ्वी के बारे में कुछ नहीं पता था। दूसरे व्यक्तियों को देखकर उनका अनुकरण करके वह पृथ्वी पर मनुष्य की सारी चीज़ें सीखता रहता है। सभी लोगों से अपने संकेतक के बारे में पूंछने पर उसे नकारात्मक ही उत्तर मिलता है लोग उसे जो बता देते हैं वह वही करने लगता है। लोगों के द्वारा कहने पर "तुम्हारे लिए भगवान ही कुछ कर सकते हैं" यही वाक्य बार बार सुनकर वह भगवान को ढूंढने लगता है। अब बच्चा तो एक परिवार में जन्म लेता है और परिवार से ही वह भगवान के बारे में जानता है। यहाँ pk है जो पृथ्वी पर बड़ा होकर ही आया। भगवान से मिलने के लिए वह भगवान को ढूंढने के लिए पोस्टर भी छपवाता है जिसपर लिखा होता है, 'लापता' और नीचे होती है भगवान की तस्वीर। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्मों के भगवानों से वह अपने उस संकेतक की मांग करता है जिससे वह अपने घर वापस जा सके, इसी प्रयास में वह सभी धर्मों के रीति-रिवाज़ों का अनुसरण करता है और भगवान से प्रार्थना है। ये सब करने के बाद भी उसका संकेतक उसके हाथ नहीं लगता है तो वह सोचता है कि शायद उसकी बात शायद भगवान तक नहीं पहुँच रही है।
        एक कार्यक्रम के दौरान pk अपना संकेतक तपस्वी बाबा के पास देखककर दौड़कर उसे पाने की कोशिश करता है लेकिन उसके संकेतक को भगवान शंकर के धमरू से टूटा हुआ मनका बताकर उसे सुरक्षा कर्मियों के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है। ये सब जानकार जग्गू pk के द्वारा तपस्वी बाबा के ढोंगों का पर्दाफ़ास करने का विचार बनाती है। pk का साथ लेकर जग्गू ने आम नागरिकों को जागरूक किया, जिससे लोग तपस्वी बाबा के द्वारा बताई गयी गलत बातों का प्रतिकार करने लगे जो जग्गू और उसकी न्यूज़ रिपोर्टर टीम का मक़सद था उसमे उन्हें कामयाबी मिलने आसार लगने लगे। pk का साथ लेकर जग्गू की टीम ने अंत में ढोंगी तपस्वी बाबा का ढोंग का भरा घड़ा फोड़ दिया, जो वर्तमान में चल रही गतिविधियों पर भी कटाक्ष करता है। अंत में pk ने जग्गू को उस लड़के से भी मिलवाया जिससे वह और वो लड़का सरफ़राज़ बेइंतेहा मोहब्बत किया करते थे, लेकिन तपस्वी बाबा की भविष्यवाणी जग्गू के दिमाग में बैठ जाने के कारण जग्गू ग़लतफ़हमी का शिकार हो जाती है, ये सस्पेंस निर्देशक द्वारा अंत में खोलने की वजह से दर्शकों में रोमांच पैदा हो गया और पिक्चर हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता है।
        कहानीकार और निर्देशक साहब दोनों ने इस फ़िल्म की रचना करके बेशक समाज में परिवर्तन लाने का प्रयास किया है। अंत के दृश्य में यह भी दिखाया है कि pk जब अपने ग्रह को वापस लौट रहा होता है तो जग्गू से बिछड़ने के गम में उसकी आँखों में आंसू होते हैं आखिरकार pk का जग्गू से प्यार होना भी दिखाना था, नहीं तो मुख्य भूमिका में आमिर खान और अनुष्का अधूरे से जान पड़ते लेकिन शादी इसलिए नहीं कर सकते थे क्योंकि pk (आमिर खान) एक एलियन है और उसे घर वापस भी भेजना था। फ़िल्म के माध्यम से pk की पूरी टीम ने सभी धर्मों में व्याप्त अंधविश्वासों का खुलकर विरोध किया है, समाज में फैली हुई बुराइयों पर कटाक्ष किये है चोरी करना, झूठ बोलना, बेईमानी करना आदि को नकारात्मक रूप में अच्छी तरह प्रस्तुत किया गया है। फ़िल्म में गीतों की संख्या कम रखने से यह जाहिर होता है कि निर्देशक ने दर्शकों का ध्यान फ़िल्म की कहानी पर केंद्रित रखने का प्रयास किया है। फ़िल्म का हर दृश्य रोमांच पैदा करता है और हास्य-व्यंग्य शैली का अच्छा प्रयोग किया गया है।


आज़र ख़ान
शोधार्थी, हिंदी विभाग
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
ईo मेल-azar786khan@gmail.com
मोo-8791102723

1 comment:

  1. फिल्म की खूबियों से परिचित करता सुन्दर लेख।इस फिल्म में वही हरिशंकर परसाई वाला स्टाइल दिखाया गया है कि पृथ्वी की स्थितियों को दिखाने के लिए परसाई मातादीन को चाँद पर भेज देते है,भोलाराम के जीव को खोजने नारद जी पृथ्वी पर आते हैं, 'मैं नर्क से बोल रहा हूँ' कहानी में मनुष्य को अपनी स्थितियो को बताने के लिए मारना होता है। वही फिल्मकार ने इस पीके फिल्म में दिखाया है ।जो बातें फिल्म के नायक द्वारा कही गयी है वो इतनी प्रभावी न होती अगर वह दुसरे गोले से ना आया होता ।

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