और बस ख़ामोशियाँ पसरी हुई थीं

और बस ख़ामोशियाँ पसरी हुई थीं...
स्याह मंज़र और जुगनू भी नदारद

खंडहर उजड़ा हुआ जर्जर खड़ा था
एक परछाई कसी थी, बेड़ियों में

कसमसाती छटपटाती रो रही थी
ताक पर रक्खा हुआ था एक दीया

बुझ रहा था जल रहा था तड़फड़ाता
कुफ़्र दौड़ा आ रहा था बेमुरौव्वत

और बस ख़ामोशियाँ पसरी हुई थीं.....
और बस ख़ामोशियाँ पसरी हुई थीं...

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

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