चराग़-ए-दिल बुझाना मत

चराग़-ए-दिल बुझाना मत 
अभी तो रात बाकी है 
अभी तो राह भटके की 
बहुत सी बात बाकी है I
चराग़े-दिल बुझाना मत...
अभी यादों से लड़ना है 
अभी वादों में गलना है 
अभी कुछ देर ठहरो तो 
हमारी मात बाकी है I
चराग़े-दिल बुझाना मत...
सहर में शोखियाँ होंगी 
मग़र तन्हाईयों का क्या 
किसी बरबाद के हक़ में 
अभी सौगात बाकी है I 
चराग़े-दिल बुझाना मत...
सुकूँ के घर की बेटी थे 
कशमकश से हुआ रिश्ता 
दुल्हनिया सज के बैठी है 
अभी, बारात बाकी है I 
चराग़े-दिल बुझाना मत...
चराग़े-दिल बुझाना मत 
अभी तो रात बाकी है

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

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