ग़ज़ल- आप अपनी आँच में ही, बारहा गलता रहा

आप अपनी आँच में ही, बारहा गलता रहा 
पर अँधेरी-ज़िन्दगी में चाँद-सा जलता रहा I

वो थका था मैं नहीं कि वो रुका था मैं नहीं 
मैं तो उसके साथ, टूटे-पाँव भी चलता रहा I

मुद्दतों के बाद, ख़ुद को जानकर, हैरान हूँ 
कि जिसे मैं पूजता था वो मुझे छलता रहा I

थी किसी की कुव्वतें जो घाव दे जाता मुझे ?
मैंने ख़ुद ही खार बोये और वो फलता रहा I

एक सूरज ढल रहा था रोज़ वक़्ते-शाम को 
और दूजा कौन था जो शाम को ढलता रहा ?

कर्ज़े-जाँना भी चुकाना ये ज़माना हाय..उफ़ 
छातियों पे मूँग रख के रोज़ ही दलता रहा I

कारवाँ को छोड़कर के लौट आया 'दीप' मैं 
पाँव भी चलते रहे ओ हाथ भी मलता रहा I

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

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