‘मैला आँचल’ में चित्रित आदिवासी शोषण

मैला आँचल फणीश्वरनाथ रेनु का प्रतिनिधि उपन्यास है। यह हिन्दी का एक श्रेष्ठ और सशक्त उपन्यास है। नेपाल की सीमा से सटे उत्तर-पूर्वी बिहार के एक पिछड़े ग्रामीण अंचल को पृष्ठभूमि बनकर रेणु ने इसमें वहाँ के जीवन का जिससे वह स्वयं ही घनिष्ट रूप से जुड़े हुए थे, अत्यन्त जीवन्त और मुखर चित्रण किया है। सन् 1954 में प्रकाशित इस उपन्यास की कथावस्तु बिहार राज्य के पूर्णिया जिले के मेरीगंज की ग्रामीण जिंदगी से सम्बन्ध है। यह स्वतन्त्र होते और उसके तुरन्त बाद के भारत के राजनातिक, आर्थिक और सामाजिक परि दृश्य का ग्रामीण संस्करण है। मेरीगंज पूर्णिया जिले का नेपाल से गंगातट तक व्याप्त परती धरती पर बसा भारत माता के मैले आँचल में लिपटा एक पिछड़ा हुआ गाँव है। पिछड़े गाँवों का प्रतीक मानकर, इसे रेणू जी ने पसन्द किया लेकिन नाम की पसन्द में सचमुच प्रतीकात्मकता है। इस पुरातन देश का रूढि़यों की परतों के नीचे दबा हुआ मृतप्राय एक गाँव और नाम है उसका मेरीगंज भारत के नक्शे पर फैली गरीबी, जहालत, अन्धविश्वास से युक्त छिछली जि़न्दगी से भरी और पिछड़ी दुनिया ही मैला आँचल है। भारतवर्ष गाँवों का देश है। आज भी भारत की अत्यधिक जनता गाँवों में रहती है। यदि कोई भारत की मूल संस्कृति और आत्मा का दर्शन करना चाहता है। तो वह भारतीय गाँवों में ही प्राप्त कर सकता है। ‘‘जिस समय रेणु का जन्म हुआ परिवार पर ऋण था। दादी माँ कहने लगी कि ऋण में जन्म लिया है, इनका नाम रिनुआ रखो, रिनुआ कहते-कहते ‘रेणु’ नाम पड़ा। फणीश्वरनाथ पर सचमुच में समाज व धरती पर व्याप्त शोषण का ऋण था। उसी ऋण को उतारने के लिए वे लेखनी को अपनाते हुए मानव अधिकारों के लिए लड़ते रहे।”1

        आदिवासी को अपनी खेती बचाने के लिए जानवर और जमीदार से लड़ना पड़ता है। ठंड के महीनों में आदिवासी अधनंग कपड़ों में खेती की पहरेदारी करते हैं। रोजी़ रोटी के लिए वे जंगली जानवरों के सामना करने के लिए नहीं डरते है। लेकिन वे जमीदारों के सामने वे अपनी सारी ताकत दाँव पर पर लगाते है। इसी तरह सरकार जब विकास के नाम कर उन्हें अपनी जमीन से बेदखल कर देती है तो वे कुछ नहीं कर पाती है। आदिवासियों का शोषण करने को कोई पीछे नहीं है। जमीदार, चोर, पुलिस, व्यापार इस तरह कई इन्हें लूटते है। विरोध किया तो इन्हें थाने में बुलाया जाता है। दुकानदार झूठे कर्जे के नाम पर उससे पैसा बसूलते हैं। कानून और नियम से अनजान आदिवासी इनके शिकार होते हैं। लोग आदिवासी झोपडि़यों में आकर स्त्रियों का बलात्कार करते हैं। उनके घर तबाह कर निकल जाते हैं। भारत में कई प्रमुख समुदाय हैं जैसे-मुंडा, बोडो, गोड, संथाल, खाली, सहरिया, गरसिया मीणा, उर्रार, बिरहोर आदि। जल-जंगल और जमीन से जुड़े आदिवासियों ने जीवन को मूल्यवान मानते हुए अपने सम्पूर्ण जीवन को विशेष परंपराओं तथा कर्मकांड में बाँध रखा है। अभाव और नीरसता से भरा जीवन जीना आदिवासियों के लिए सहज नहीं था। इसलिए उन्होंने जीवन में उत्सवधर्मिता लाने के लिए संगीत को आधार बनाया। दिन-भर का थका-हारा आदिवासी अपनी झोपड़ी में रूखा-सूखा खाकर घर के बाहर, पेड़ के नीचे या नदी के किनारे पूरे परिवार व समूह के साथ चांदनी रात में मादल की थाप और पैरों की थिरकन से थकान मिटाकर आनन्द की अनुभूति करता है। 

        रेणु जी ने इस उपन्यास के माध्यम से दर्शाया है कि हमारे देश में आदिवासी को बाहर का आदमी समझा जाता है। लोग उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं। उन्हें समाज से परे कर देते हैं। उनका शोषण कर उन पर अत्याचार करते हैं। गाँव के लोग उन की जमीनों पर कब्जा कर लेते हैं। गनोरी चिल्लाता है-‘‘चलो। चलो। मारो।........साला संथाल! बाहरी आदमी।.......जान जाए तो जाए। तहसीलदार विश्वनाथ की ही जमीन पर धावा किया है।.......चलो रे।”2 रेणु जी ने मैला आँचल के माध्यम से वर्तमान समाज के लोगों की मायिकता को अपनी लेखिनी के माष्यम से प्रकट किया है। आदिवासियों को लोग बाहर का मानते है। जीवन पर्यन्त लोग उनका फायदा उठाते रहते हैं। मैला आँचल में भी यही दर्शाया गया है। आखिर हार कर वे बगावत पर उतर आते हैं। ‘‘किसी समुदाय की संस्कृति उसके जीवन के पूरे दायरे (देश काल) में अर्जित मूल्य बोध की पूँजी होती है और उसके लिए पहचान (अस्मिता, आइडेंटिटी) के संकट का सबाल तब आता है। जब वह देखता है कि उस पर आक्रमण हो रहे है, जब उसकी पहचान के विघटन होने का भय उसे आतंकित करता है।”3 संथाल लोग और गैर आदिवासी लोगों में संग्राम छिड़ जाता है। दोनों तरफ से वार पे वार शुरू हो जाते हैं। संथालों के डिग्गा और मदाल एक स्वर में बोल उठे-रिंग-रिंग-रिंग-रिंग-रिंग। डा-डा-डा-डा। काली माई, इनकिलाब जिन्दाबाद, महात्मा गाँधी की जय के स्वर गूँज रहे हैं। युद्ध का विगुल बज उठा है-‘‘आज रिंग-रिंग-ता-धिन-ता अथवा डा-डिग्गा-डा-डिग्गा नहीं सिर्फ रिंग-रिंग-रिंग-रिंग......डा-डा-डा-डा।.......यह खेत में बजा रहा है, संथालियों को सचेत कर रहा है, तुम लोग भी तैयार रहो.......डा-डा-डा-डा।......संथालिनें जवाब देतीं......रिं-रिं-रिं-रिं। अर्थात तैयार हैं, जूड़े में फूल खोंसने में बस जितनी देर लगे। तैयार हैं।”4

        बच्चे और संथालिन सभी मोर्चे पर डँटे हैं। तीर तहसीलदार हरगौरी को लग जाता है। सभी गाँव वाले उन संथालों पर टूट पड़ते हैं-‘‘तहसीलदार ? हरगौरी तहसीलदार गिर पड़ा ?.......भागो मत। ऐ! सुनो! तुम लोगों को अपना माँ-बहन की कसम, गुरू-देवता की कसम, काली किरिंया।........जो भागे वह दोगला।.......संथालों के तीर खतम हो रहे हैं। अब घेर के मारो।.........मंगलदास को संभालो। चलो! जै, काली माई की जै।
          ‘‘मारो भाला। अरे बच्चा नहीं है, इसी ने तहसीलदार को मारा है।”
          ‘‘वाह-बहादुर! ठीक है।........अब लगाओ गुलेटा उस बूढ़े को, साला डिग्गा बजा रहा है!....
          ‘‘भाग रहा है। साला सब भाग रहे हैं। घेरो। भागने न पावें। संथालिने पाट के खेत में छिपी हुई हैं। घेर लो।”5

        उपन्यास में लेखक ने गैर आदिवासियों की आदिवासियों के प्रति अमानवीय कू्ररता का वर्णन इस प्रकार किया है - ‘‘एक दम ‘फिरी’ आजादी है, जो जी आवे करो ! बूढ़ी, जवान, बच्ची जो मिले। आजादी है। पाट का खेत है। कोई परवाह नहीं।....फाँसी हो या कालापानी, छोड़ो मत।”6 सब तरफ से मातम फैला हुआ है। संथालिनें भी दर्द से छटपटाती हैं। चिल्लाती हैं। रेणु जी ने बड़ी ही सजीवता से आदिवासी जीवन की पीड़ा को व्यक्त किया है। जहाँ हर किसी दृष्टि नहीं पहुँच पाती है। कुहराम मचा हुआ है। पाट के खेतों में कोठी के जंगल में........कहाँ दो सौ आदमी और कहाँ दो दर्जन संथाल, डेढ़ दर्जन संथालिनें। संथाल टोली के चार आदमी ठंडे हुए सात घायल होकर अस्पताल में पड़े हैं। वे लोग भी गिरिफ्त में हैं। पुरैनियाँ अस्पताल में बन्दूक वाले मलेटरी का पहरा है। गैर संथाल छूट जाते हैं। उन्हें कुछ नहीं होता। ऊपर से लेकर नीचे तक सब भ्रष्टाचार में लिप्त है। उनकी जमीन दस एकड़ रामकिरपाल सिंह तहसीलदार, विश्वनाथप्रसाद को लिख दी है और सुमरितदास को भी चार कट्ठा जमीन मिली है...........

        मैला आँचल के सन्दर्भ में भारत यायावर लिखते हैं - ‘‘मैला आँचल’ गतवर्षा के ही सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में नहीं है, वह हिन्दी के इन सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में सहज ही परिगणनीय है........मैने इसे ‘गोदान’ के बाद हिंदी का दूसरा महान उपन्यास माना है।.......इसके लेखक को भी चित्रणीय जीवन का आत्मीयतापूर्वक ज्ञान है। परकाय प्रवेश वाली उपन्यासकारोचित सामर्थ है और सर्वोपरि है। चित्रांकन के समय एकांतिक तटस्थता एवं निर्लिप्तता बनाए रखने वाली कलाकारोचित प्रतिभा।”7

        स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उत्तरोत्तर आधुनिकता की बढ़ती चकाचौंध ने हमारी लोक संवेदनाओं को कंुठित कर दिया है। ऐसे समय में आदिवासी समाज आज भी शान्त प्रकृति की गोद में पड़ा अपनी परम्पराओं और लोक विश्वासों से गहराई से जुड़ा हुआ है। विस्थापन की त्रासदी, अपनों द्वारा अपमानित और उपेक्षित होकर भी वह अपने संस्कृति क भविष्य को बचाए रखने के लिए संघर्षरत है। विडंबना यह है कि आजादी के बाद से सरकार तंग और बाहरी सांस्कृतिक हमले लगातार आदिवासियों की सामाजिक संरचना को ध्वस्त करने में लगे हैं। फणीश्वरनाथ रेणु ग्रामीण यथार्थ के चितेरे हैं। गाँव का समग्र और संश्लिष्ट चित्रण रेणु के कथा साहित्य की अपूर्व विशेषता है। भारत के सम्पूर्ण गाँवों का प्रतिनिधित्व करता ‘मेरीगंज’ जिस रूप में ‘मैला आँचल’ में व्यक्त हुआ है। वह रूप गाँवों की नाटकीय स्थिति और जन-चेतना के दुष्प्रभावों का कलात्मक यथार्थ है। तहसीलदार हरगौरी सिंह ने रैयतों के साथ जमीन बन्दोबस्त का ऐलान कर दिया है। दूसरी ओर जमीन से जिनका इसी बीच रहस्य खुलता है कि संथालों की जमीन खुद तहसीलदार साहब ले रहे हैं। अपने नाम से नहीं ले सकते इसलिए दूसरे के नाम से। छोटे लोग अपने अधिकरों के लिए काम बंद कर विरोध प्रकट करने लगे हैं। जातिवाद उत्तरोत्तर लोगों को जकड़ कर छोटा बनाने लगा है। गरीबी और जहालत सर्वोपरि रार्ष्ट्रीय रोग के रूप में विकसित हो चुके हैं। वर्ग-संघर्ष सहज हो गया है। संथालों के साथ मुजाहमत होती है और उन्हें लाठी के बल पर बेदखल किया जाता है।

        इस प्रकार कह सकते हैं कि मैला आँचल आदिवासी शोषण का जीता जागता दस्तावेज है। सबसे पहले हिन्दी साहित्य में आदिवासी समाज से प्रस्तुत लेखक की मुलाकात रेणु के ‘मैला आँचल’ के संथालों से हुई थी, अपने जमीनी हक से बेदखल संथालों से जो अपने सत्व के लिए लड़ते-भिड़ते हैं तो जुल्म के शिकार होते हैं। रेणु पीडि़तों के साथ एक सच्चे हमदर्द की तरह रहे । वस्तुतः मैला आँचल का संथाल विद्रोह आज के आदिवासी राजनीति विद्रोह का ही बीज है, जिसने अब वृक्ष का रूप धारण कर लिया है। दवेवाड़ा, छत्तीसगढ़ आदि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। रेणु जी का नाम हिन्दी साहित्य में सदा स्मर्णीय रहेगा। “इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, चंदन भी है, कुरूपता भी- मैं किसी से दामन बचाकर नहीं निकल पाया।”8

संदर्भ -

फरहत परवीन, आजकल, अप्रैल 2016, पृ. 18
फणीश्वरनाथ रेणु: मैला आँचल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-1954, पृ. 216-217
डॉ. रामदयाल मुंडा: आदिवासी अस्तित्व और झारखंडी अस्मिता के सवाल, प्रकाशन संस्थान, संस्करण-2002, पृ. 29
फणीश्वरनाथ रेणु: मैला आँचल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-1954, पृ. 217
वही, पृ. 218
वही, पृ. 218
भारत यायावर: रेणु के साथ, वाणी प्रकाशन, संस्करण-2002, पृ. 25
फणीश्वरनाथ रेणु: मैला आँचल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-1954, (भूमिका)


तरन्नुम सिद्दीकी
शोधार्थी, हिन्दी विभाग                
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़

0 comments:

Post a Comment