प्रेमचन्द की यथार्थवादी अन्तदृष्टि और गोदान

     ‘कृषक जीवन की त्रासदी’, ‘भारतीय कृषक जीवन का महाकाव्य’ जैसे विशेषणों से अलंकृत ‘गोदान’ उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द जी की एक अविस्मरणीय यथार्थ समन्वित औपन्यासिक कृति है। प्रेमचन्द के समूचे रचनाविधान में यथार्थ के प्रति उनका आग्रह क्रमशः अधिक गहराता ही गया है। उनके शुरूआती उपन्यासों में आदर्शों के प्रति एक गहरा लगाव रहा है और सच बात तो यह भी है कि हर रचनाकार अपने साहित्य सृजन के माध्यम से समाज में आदर्श की ही तो संस्थापना चाहता है लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि हमारी आस्था आदर्शों पर इतना अधिक केन्द्रित हो जाती है कि यथार्थ सर्वथा उपेक्षित होने लगता है, समाज में जड़ता और अन्धविश्वास इस कदर व्याप्त हो जाते हैं कि समूचा सामाजिक ताना-बाना विश्रृंखलित हो जाता है। समाज की हर शिराओं में विषाक्त रक्त प्रवाहित होकर उसे जर्जर और कमजोर बना देता है और यही कारण है कि हर क्रान्तदर्शी साहित्य मनीषी को अपने सामयिक खोखले आदर्शों से मुठभेड़ करनी ही पड़ती है क्योंकि आदर्श कितना भी मोहक हो कितना भी उदात्त उसमें गनानुगतिक आस्था रखने के बजाय यथार्थ कितना भी भयावह क्यों न हो उसे स्वीकार करना ही उसे रूपान्तरण का प्रस्थान बिन्दु हो सकता है। 

     प्रेमचन्द का गोदान उपन्यास भी यथार्थ के प्रति उत्तरोत्तर प्रगतिशील उनकी यथार्थ समन्वित रचनादृष्टि का ही प्रमाण है। निर्मला वर्मा इसे इस रूप से व्याख्यायित करते हुए कहते हैं कि -‘‘कोई भी सच्चा यथार्थ आदर्श से शून्य नहीं होता जैसे कोई भी आदर्श बिना यथार्थ की ठोस अन्तर्दृष्टि के अर्थहीन और बौना हो जाता है। प्रेमचन्द के आदर्श नहीं बदले, सिर्फ यथार्थ से उनका सम्बन्ध बदल गया। वह अब भी मनुष्य की अच्छाई में विश्वास करते थे लेकिन इस अच्छाई के सामने उन्होंने पहली बार बुराई या पाप से भी साक्षात्कार किया-जिसे हम ‘ईविल’ कह सकते हैं। पैसा अपने में पाप है। यह बोध सहसा प्रेमचन्द को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है जिस मोड़ पर बिल्कुल दूसरे रास्ते से गांधी आये थे।’’2

     प्रेमचन्द जिस समय होरी को सृजित कर रहे थे वह साम्राज्यवादी अंग्रेजी सत्ता के अधीन भारत का है। एक तरफ आजादी के लिए गॉंधी का आन्दोलन है तो दूसरी ओर अंग्रेजी सत्ता द्वारा उनका कठोर दमन। यद्यपि यह दौर स्वाधीनता प्र्रेमी क्रान्तिकारी और अंग्रेजों के बीच व्यापक संघर्ष का है लेकिन ऐसे दौर प्रेमचन्द न सिर्फ स्वाधीनता आन्दोलन की प्रत्येक गतिविधि और उस समय राष्ट्र की हरएक हलचल का जीवन्त बिम्बांकन करते हैं बल्कि एक ऐसे यथार्थ से भी भारतीय समाज को अवगत कराते हैं जो अभी तो शुरूआती चरण में है लेकिन आगामी भविष्य में वह और भी बड़े भयावह और सर्वग्रासी रूप में अवतरित होगा। जिनसे मुक्ति की राहें आसान नहीं होंगी, यह भारतीय समाज को अपने खूनी पंजो में कसकर जकड़ लेगा, जहॉं इन्सान का स्थान मशीने लेंगी और मानवीय श्रम को तथा उत्पादन के सभी पूर्व प्रचलित संसाधनों को विस्थापित कर पूँजीवादी शक्तियॉं सर्वाधिक ताकतवर बनकर उभरेंगी। प्रेमचन्द अपने दौर में जिस पूँजीवादी व्यवस्था का अनुभव कर रहे थे उसे वे ‘महाजनी सभ्यता’ के नाम से अभिहित करते हैं। महाजनी सभ्यता की विशेषता की ओर संकेत करते हुए वे लिखते हैं - ‘‘इस सभ्यता का दूसरा सिद्धान्त है ‘विजनेस इज विजनेस’ अर्थात् व्यवसाय व्यवसाय है, उसमें भावुकता की गुंजाइश नहीं। पुराने जीवन सिद्धान्तों में वह लूटमार, साफगोई नहीं है, जो निर्लज्जता कही जा सकती है और जो इस नवीन सिद्धान्त की आत्मा है। जहॉं लेन-देन का सवाल है, रूपये पैसे का मामला है वहॉं न दोस्ती का गुजर है और न मुरव्वत का, न इंसानियत का।’’3

     प्रेमचन्द ने गोदान के माध्यम से भी यही दिखाने का प्रयास किया है कि जैसे-जैसे समाज प्रगति की ओर उन्मुख होगा वैसे-वैसे इंसान की आत्मा मरती जायेगी, स्वार्थ प्रबल होता जायेगा, अधिकतम स्वार्थ और अधिकतम लाभ तथा गरीबों और मेहनतकशों की मेहनत का हक मारना ही पूँजीवादी शक्तियों का लक्ष्य हो जायेगा। किसान भूमिहीन होंगे, उनकी जमीने ताकत और सत्ता के बल पर हड़प ली जायेंगी, उद्योग-धन्धे स्थापित होंगे, किसान मजदूर बनेगा और उसको उसकी मजदूरी भी मिलनी मुश्किल होगी। होरी का समूचा जीवन संघर्ष सिर्फ होरी का ही न होकर समूचे भारतीय किसानों का संघर्ष बन जाता है। होरी की इतनी छोटी सी ही ख्वाहिश थी कि अपने खेतों में जी-जान से मेहनत कर फसल उगाई जाय तथा उससे अपने परिवार का भरण-पोषण किया जाय। घर के सामने एक प्यारी सी गाय हो जिससे बच्चों का शारीरिक पोषण भी होता रहे और उसके धर्म का निर्वाह होता है, गो-सेवा का पुण्यलाभ भी मिलता रहे। लेकिन ऐसे समाज में जहॉं महाजनी सभ्यता ने अपना पैर पसारना शुरू कर दिया है वहॉं होरी जैसे किसानों की छोटी-छोटी आकांक्षायें भी अधूरी ही रह जायेंगी। क्योंकि उनकी आशा ही उम्मीदों के कोमल अंकुरण को पूँजीवादी चट्टानी ताकतों के विनाशक पंजों के नीचे रौंद जाना है-यही उनकी नियति है, और ऐसी घोर अपमानजनक तथा यातनापूर्ण त्रासद स्थिति में भी होरी जैसे किसान पिसते रहेंगे और कुचलने वाली ताकतों का पैर सहलाते रहना उनकी मजबूरी होगी, विवशता होगी, लाचारी होगी। होरी के शब्दों में - ‘‘यह मिलते-जुलते रहने का परसाद है कि अभी तक जान बची हुई है नहीं कहीं पता न लगता कि किधर गये, गॉंव में इतने आदमी तो हैं। किसपर बेदखली नहीं आयी, किसपर कुड़की नहीं आयी। जब दूसरों के पाँवों तले अपनी गर्दन दबी हुई है तो उन पाँवों को सहलाने में ही कुशल है।’’लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि होरी का यह पॉंव सहलाने का तरीका भी उसकी गर्दन को रौंदे जाने, कुचल कर मरोड़ दिये जाने से न बचा सका। उसके सारे मानवीय तरीके जो सामान्य जन की वाजिब चालाकियों से भरे थे-उसके प्राणों की रक्षा न कर सके। बनियों, पण्डितों, धर्म के ठेकेदारों, महाजनों, सामन्तों, जमींदारों सब ने मिलकर उसका शोषण किया। होरी की यह संघर्षगाथा आज हमारे लिए और भी अधिक प्रासंगिक और हमारी सुषुप्त चेतना को जागृत करने के लिए और भी अधिक प्रेरक है क्योंकि आज तो पूँजीवादी ताकतों ने सरकारों से साठ-गॉंठ कर किसानों की जमीन को हथियाने का उपक्रम और भी तेज कर दिया है। किसानों को उनकी ही जमीन से बेदखल किया जा रहा है, बड़े-बड़े करखाने तथा उद्योग धन्धे स्थापित किये जा रहे हैं, पुनर्वास तथा मुआवजे के झूठे प्रलोभनों ने उनकी जमीन से उन्हें ही विस्थापित कर दिया है तथा ऊपर से चोला ऐसा ओढ़ रखे हैं कि जैसे वे किसानों के उद्धारक हों, मसीहा हों, समाज सुधारक हों, लेकिन सच तो यह है कि रक्तपायी भेंडि़ये हैं जो किसान को भुखमरी के कगार तक पहॅुंचाकर उन्हें आत्महत्या के लिए विवश करते हैं प्रेमचन्द इस महाजनी सभ्यता के मानवघाती स्वरूप को बड़ी ही अच्छी तरह से पहचानते थे, और अपनी कालजयी कृति गोदान के माध्यम से समूची भारतीय जनता को इस समय से चेतने के लिए ही आगाह करते हैं। लेकिन दुर्भाग्य भारत का कि न तो प्रेमचन्द के समय किसी ने इस खतरे को गम्भीरता से लिया और न आजाद भारत के नीति-नियन्ताओं ने और यही कारण है कि समूचा राष्ट्र अपने देश के किसानों की हत्या (आत्महत्या) में मूकदर्शक ही बना हुआ है। भारत में अन्नदाता की यह अनन्न स्थिति बड़ी ही मर्मान्तक और हृदयविदारक है, चिन्ताजनक तो है ही क्योंकि हमारे अर्थशास्त्रियों ने इस पर चिन्तन करना जो बन्द ही कर दिया है। 

     अगर हम प्रेमचन्द की रचना दृष्टि से सबक ले सकते तो हमारे अपने समय और समाज के तमाम कोहरे छँट चुके होते और प्रेमचन्द तो साहित्य लक्ष्य ही यही मानते हैं। उनके शब्दों में -‘‘लिटरेचर का मौजू (विषय) है तहजीब (संस्कृति), अखलाक (नैतिकता), मुशाहिद-ए-जजबात (भावाभिव्यक्ति), इन्कशाफे-हकायक (सत्योद्घाटन) और वारदातों कैफियाते-कल्ब का इजहार (दिल की हालातों का प्रकटीकरण)।’’5



सन्दर्भ -

  1. निराला होने का अर्थ और तीन लम्बी कविताएँ-सं0 राजेन्द्र कुमार, पृष्ठ-19। 
  2. शताब्दी के ढलते वर्षों में-निर्मल वर्मा पृष्ठ-309
  3. गोदान एक पुनर्विचार सं0-परमानन्द श्रीवास्तव पृष्ठ-164
  4. गोदान-प्रेमचन्द, पृष्ठ-07
  5. प्रेमचन्द-सं0 विश्वनाथ प्रसाद तिवारी पृष्ठ-16



डॉ. रामचन्द्र पाण्डेय
अतिथि प्रवक्ता
हिन्दी विभाग,
ईश्वर शरण डिग्री कालेज,
इलाहाबाद

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