वादे


मैं
भूला चुका हूँ
गाँव से किए वादे
पी गया हूँ
आश्वासनों को कॉफी में,
बहुत दिनों से
देख नहीं पाया हूँ
गोबर से लिपी पुती दीवार
और देखी नहीं
किसी आंगन में तुलसी,
बहुत दिनों से
भेड़ों के साथ
जंगल नहीं गया हूँ
सुनी नहीं है डाँट
चुराई नहीं हैं
पड़ोसी के
खेत से नाशपातियां,
खेलेंन हीं
मैंने
दोस्तों के साथ कन्चें
और बनाया नहीं
नदी के किनारे घराट,
भूल गया हूँ
मक्की की रोटियों
और
लस्सी का स्वाद,
गाँव से
शहर आकर
दूर हो गया हूँ
मैं माँसे।
कैसे करूँ विश्वास
शहर मे जब हो
अराजकता
सुरक्षित ना हो आबरू
स्वतंत्रन हो सासें
मोड़ पर खड़ी हो मौत
तो मैं कैसे करूँ विश्वास तुम्हारा,
बाहर से दिखते हो सुन्दर
रचते हो भीतर भीतर ही षड़यंत्र
ढूँढते रहते हो अवसर
किसी के कत्ल का
तो मैं
कैसे विश्वास करूँ तुम्हारा,
तुम्हारा
विश्वास नहीं कर सकता मैं
सांसों में तुम्हारी
बसता है कोई और
तुम वादे करते हो किसी और से

रौशन जसवाल ‘विक्षिप्त’
सम्पर्क, शान्त कंवल कुंज, ढली शिमला

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