ग़ज़ल- यकीनन ये कभी भारी पड़ेगी

यकीनन ये कभी भारी पड़ेगी
गमों पर इक खुशी भारी पड़ेगी

मचलकर बात करता है हवा से
चमन को दिल्लगी भारी पड़ेगी

ये पीती जा रही है विष निरंतर
समंदर को नदी भारी पड़ेगी

शराफत को न यूँ हल्के में लेना
किसी दिन ये बड़ी भारी पड़ेगी

खुदी में खूब गहरा हूँ उतरता
मुझे डुबकी मिरी भारी पड़ेगी

कई होंगे मगर अनमोल तुमको
हमारी इक कमी भारी पड़ेगी

के. पी. अनमोल
वेब पत्रिका ‘हस्ताक्षर’ में प्रधान संपादक

0 comments:

Post a Comment