अब्दुल हमीद के बहाने से...

“बावन साल पुरानी आँखें कब तक जागें?
देखे अनदेखे सपनों से भागें,
कब तक भागें?
हर लम्हा एक रेत का जर्रा
हर जर्रा है खुद एक सहरा
गिनतें-गिनते हार गए हम
लगता है बेकार गए हम ........।”1

        जीवन निरंतर गतिशील है। अतः समय के साथ-साथ मनुष्य के दृष्टिकोण में परिवर्तन परिलक्षित होता है, साथ ही जीवन मूल्यों में भी बदलाव आते रहते हैं। स्वातंत्र्योत्तर काल में तो मूल्य-परिवर्तन की प्रक्रिया और अधिक गतिशील हो गई है। हमारी प्राचीन मान्यताओं, आदर्शों और मूल्यों का विघटन हो रहा है। वहीं परंपरा एवं प्रगति में परस्पर संघर्ष की स्थिति को भी नकारा नहीं जा सकता है। अतः समय की गतिशीलता ने जन-साधारण की सोच व उसके विचारों में व्यापक परिवर्तन लाने का कार्य किया है। जीवन मूल्यों के ह्रास के साथ, आज संवेदनाएँ भी विलुप्त होने की कगार पर हैं। लोगों के जीवन में सौहार्द्र का स्थान संदेह ने ले लिया है। देश की एकता और अखण्डता पर सांप्रदायिक उन्माद हावी होने लगा है। ऐसी परिस्थितियों में, राही मासूम रजा़ कृत ‘छोटे आदमी की बड़ी कहानी’ नामक जीवनी, देशहित में विविध सरोकारों को उभारकर सामने लाती है।

‘छोटे आदमी की बड़ी कहानी’ में लेखक ने सन् 1956 के सितंबर माह में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान शहीद हुए अब्दुल हमीद के जीवन-चरित्र को उद्घाटित किया है। वास्तव में, यह एक ऐसे हिन्दुस्तानी की कहानी है जो साधारण परिवार से है, जिसने अपने देश के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी, जिसने अपनी मातृभूमि का कर्ज़ अपने जीवन की आहूति देकर चुकाया। ‘‘मेरे देश में पैंतालीस करोड़ हिन्दुस्तानी बसते हैं और आज मैं उन्हीं हिन्दुस्तानियों में से एक की कहानी सुनाना चाहता हूँ। उसका नाम अब्दुल हमीद था। न वह कोई हीरो था और न मैं उसे हीरो बनाना चाहता हूँ। वह एक मामूली हिन्दुस्तानी किसान था। मैं उसी किसान से आपको मिलाना चाहता हूँ। बड़े आदमियों का जीवन चरित्र खींचा आसान है, परन्तु एक साधारण आदमी की जीवन कथा लिखना असंभव है।”2 स्पष्ट है कि राही अब्दुल हमीद को हिन्दुस्तानी किसान व हिन्दुस्तानी मुसलमान का प्रतीक मानते हैं। वह इस जीवनी के माध्यम से उन लोगों को जवाब देना चाहते हैं जिन्होंने ‘मज़हब’ व ‘क़ौम’ के नाम पर देश का बँटवारा कर दिया था। साथ ही उन लोगों को भी उत्तर देते हैं जो विभाजन के पश्चात हिन्दुस्तान में रहने वाले देशभक्त मुसलमानों को भी संदेह की दृष्टि से देख रहे थे।

        इस जीवनी के द्वारा लेखक यह स्पष्ट घोषणा करता है कि यह देश जितना अन्य धर्मों के लोगों का है, उतना ही मुस्लिम धर्म के लोगों का भी है। भारतीय मुसलमान भी उसी मिट्टी का बना है जिस मिट्टी के यहाँ के अन्य लोग बने हुए हैं। उन्हें अपनी देशभक्ति के लिए किसी भी प्रकार के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता नहीं है और न ही उन्हें कदम-कदम पर मातृभूमि के प्रति अपनी निष्ठा साबित करने की जरूरत है। राही धर्म के नाम पर भेदभाव करनेवालों को असली देशद्रोही मानते हैं। उन्होंने अब्दुल हमीद की जीवनी के प्रारंभ में लिखी गई अपनी वसीयत में कहा है - ‘‘वतन मज़हब नहीं है जो बदला जा सके। कोई तुमसे हिन्दुस्तानी होने का हक़ नहीं छीन सकता। तुम हिन्दुस्तानी हो क्योंकि मैं हिन्दुस्तानी हूँ। जो लोग यह कहते मिले कि तुम हिन्दुस्तानी नहीं हो, उन्हें झूठा और देशद्रोही जानो।”3

        परमवीर-चक्र विजेता अब्दुल हमीद की जीवनी के माध्यम से राही ने वास्तव में धर्म, राष्ट्र, देश तथा राष्ट्रीय विरासत आदि प्रश्नों पर गहराई से चिंतन व्यक्त किया है। साथ ही, यह भी सिद्ध किया है कि भारतीय मुसलमान की देशभक्ति, किन्हीं अर्थों में भी, दूसरे धर्म के लोगों की देशभक्ति से कम नहीं है। अब्दुल हमीद की जीवनी के बहाने से लेखक ने ‘‘धर्म, राजनीति और सत्ता के रिश्तों पर विस्तार से चर्चा की है और चेतावनी दी है कि धर्म के हथियार को राजनीति पर चलाया गया तो देश का भविष्य अंधकार में होगा। धर्म व्यक्तिगत चीज़ है। उसका व्यापार करने पर अनेक त्रासदियों का जन्म होगा।”4 दस शीर्षकों में विभाजित इस जीवनी में लेखक ने अब्दुल हमीद के जीवन के प्रत्येक पक्ष को उद्घाटित किया है। अब्दुल हमीद का जन्म 1 जुलाई, सन् 1963 को ग़ाजीपुर जि़ले के धामूँपुर नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता (उसमान) कपड़े सिलकर घर का खर्च चलाते थे। स्पष्ट है कि ‘‘सागर हर युग में मथा जाता है और विष पीने के लिए हर युग में शंकर को जन्म लेना पड़ता है - भगवान को सांप्रदायिकता का ज़हर पीने के लिए जन्म लेना पड़ा तो उन्होंने धामूँपुर जैसे गुमनाम गाँव में एक गुमनाम दरजी उसमान के घर को चुना।”5
राही को अपने हिन्दुस्तानी होने पर गर्व है। परन्तु इस बात की पीड़ा भी है कि उन्हें और उन जैसे अनेक मुसलमानों से देशभक्ति का प्रमाण माँगा जाता है। भारतीय मुसलमानों के प्रति संदेह की दृष्टि उन्हें व्यथित करती है। तभी तो, वह अब्दुल हमीद की शहादत के बाद देश की कट्टर व सांप्रदायिक शक्तियों से सवाल करते हैं - ‘‘क्या हमीद का खून देश के साम्प्रदायिक वातावरण की धूल बिठाने में सफल होगा ? क्या अब पाकिस्तानी शासकों की कमीनगी का दाम हिन्दुस्तानी मुसलमानों से नहीं माँगा जाएगा ? क्या अब यह बात साफ हो गई है कि यह जो भारत माँ है, यह बच्चन सिंह और अब्दुल हमीद दोनों की जननी है।”6 वास्तव में, अब्दुल हमीद की जीवनी केवल एक मुसलमान सिपाही के जीवन-चरित्र का ही प्रतिनिधत्व नहीं करती, अपितु यह उन समस्त वीर सैनिकों की जीवनी में परिवर्तित हो जाती है जिन्होंने धर्म के सामने राष्ट्र को सर्वोपरि माना। एक ओर जहाँ इसमें अपने देश के प्रति गर्व की भावना झलकती है, तो वहीं आवश्यकता पड़ने पर देशहित में प्राण न्यौछावर करने का अटल संकल्प भी मिलता है। निस्संदेह, ‘‘अब्दुल हमीद ने अपने खून की आँच से इस दीवार को पिघला दिया, जिसने हमारे हिन्दुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे से अलग कर रखा था।”7

        वास्तव में राही ने यह जीवनी लिखकर बहुत सारे सवाल उठाए हैं और उनके उत्तर भी तलाशने का प्रयत्न किया है। 17 सितम्बर, 1965 को वीरगति-प्राप्त अब्दुल हमीद को लेखक ने ‘‘हिन्दुस्तानी बहादुरी की परंपरा और हिन्दुस्तान के हौसले का सिम्बल” माना है। वस्तुतः ‘‘खून की रोशनाई से दिलों की भाषा में लिखी गई।”8 यह जीवनी, एक सच्चे हिन्दुस्तानी की जीवनी है जो देश के समस्त देशभक्त मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता है और जिसकी शहादत हिन्दुस्तानी मुसलमानों को सर उठाकर जीने का अधिकार मिलने का समर्थन करती है। श्री प्रकाश शुक्ल के शब्दों में, ‘‘कुल मिलाकर यह वीर अब्दुल हमीद की जीवनी है। धामूँपुर की जीवनी है। गा़ज़ीपुर की जीवनी है। देश की जीवनी है। यह कहते है कि यह इतिहास गाथा है जिसमें इतिहास है। भूगोल है। और पूरा का पूरा भारतीय समाज। व्यक्ति कैसे एक संदर्भ बनता है, इसे यहाँ देखा जा सकता है। राष्ट्रीयता कैसे सिर चढ़कर बोलती है, उसे इस जीवनी में समझा जा सकता है।”9 ये पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से, इस जीवनी की सार्थकता और वास्तविकता को उद्घाटित करती हैं।
        वर्तमान समय में, जब कुछ स्वार्थी एवं कट्टरपंथी तत्वों के द्वारा समाज में घृणा व सांप्रदायिकता का बीज वपन किया जा रहा है, राष्ट्रीय एकता के स्थान पर वैमनस्य का विषबेल चहुँओर व्याप्त हो रहा है और धार्मिक उन्माद सिर चढ़कर बोलने लगा है, ऐसी परिस्थितियों में परमवीर-चक्र विजेता अब्दुल हमीद की प्रेरक जीवनी और भी अधिक प्रासंगिक हो उठती है। एक संपूर्ण भारतीयता की पड़ताल करती यह जीवनी, धर्म एवं राष्ट्र के पार्थक्य का सफल रूप में उद्घाटन करती है। साथ ही साथ, यह उन असामाजिक तत्वों से लोहा लेने का भी भरसक प्रयास करती है जो राष्ट्रप्रेम की भावना को भी धर्म की तुला पर तोलकर देखते हैं। वास्तव में, अब्दुल हमीद के बहाने से यह जीवनी देश की अस्मिता के लिए हर हिन्दुस्तानी के बलिदान के संकल्प को पुनः जीवंत बना देती है।

संदर्भ-

1. राही मासूम रजा़, ‘लगता है बेकार गए हम’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 1999, पृ0 60
2. राही मासूम रजा़, ‘छोटे आदमी की बड़ी कहानी’, डॉ0 कुँवरपाल सिंह (सं0), ‘बड़ी कहानी की कहानी’, शिल्पायन प्रकाशन दिल्ली, 2004, द्वितीय संस्करण पृ0 13
3. राही मासूम रजा़, ‘छोटे आदमी की बड़ी कहानी’, वसीयत
4. डॉ0 कुँवरपाल सिंह (सं0), ‘बड़ी कहानी की कहानी’, पृ0 9-10
5. ‘छोटे आदमी की बड़ी कहानी’, पृ0 33
6. वही, पृ0 21
7. वही, पृ0 16 (भूमिका)
8. वही, पृ0 54
9. श्री प्रकाश शुक्ल, ‘एक हिन्दुस्तानी की कहानी’, डॉ0 कुँवरपाल सिंह (सं0), ‘राही और उनका रचना संसार’, शिल्पायन प्र0, दिल्ली, 2004, पृ0 266

अम्बरीन आफताब
शोधार्थी (जे. आर. एफ.),
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़

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