युद्ध


सारे के सारे मसले जस के तस हैं 
बस एक तू ही है जो साथ नहीं है आजकल 
सीमाएं हैं देश की, उनपर विवाद भी 
जस की तस, सरहदों पर जान देते 
और जान लेते सिपाही भी और उनके 
कंधों पर लटकती बंदूकें और कमर में
बंधी मैग्जीनें भी
वो दर्द भी है जिसका कोई मरहम 
बना नहीं है आजतक 
हर कदम दर कदम तेरी याद आती है बहुत 
भींग जाती हैं आँखों की कोरें
इस दीवाली , उस होली 
न होगा साथ तू
तेरी यादें सिर्फ होंगी
सारी लड़ाइयों का है एक ही हल
अंत में समझौता 
सारे के सारे झगड़ों और फसादों का
एक ही फल
कुछ लाशें, कुछ जले उजड़े हुए मकान 
वीरान बस्तियां और 
सारी जिंदगी का दर्द 
ये सारी असहनीय चीज़ें 
जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं 
ठीक उन युद्धों की तरह 
जिनका हासिल कुछ भी नहीं 
पर शून्य के नीचे भी गणनाएं 
होती हैं 
बहुत अनिवार्य 
एकदम जरूरी 
पर किस के लिए ?

मिथिलेश कुमार त्रिपाठी, नागपुर

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