साहित्यकार का मर्म

साहित्यकार का मर्म

मुंशी जी ने कहा तुम्हें तो हिन्दी नहीं आती
धीरे-धीरे आ जाएगी
प्रेमचंद ने विनम्रता से कहा
वो उर्दू माध्यम से नाम कर चुके थे
वो बड़े कलाकार हो चुके थे।
प्रबुद्ध जनों ने परंपरा डाली है
भर्तियाँ करने की
जाति और धर्म के नाम पर
योग्यता तो आ ही जाएगी-
इस विश्वास के साथ।
जिस जाति और धर्म का संस्थान
उसी वर्ग के सदस्य
बड़ा कवि, कहानीकार बनना है
तो पहले आलोचक तैयार करो
संपादक बनाओ
सुंदर बनो, अश्लीलता, फूहड़ता
नये कलेवर में पेश करो,
वो बाजार में तुम्हें उतार देंगे
फिर बिकना तुम्हारी खूबी पर
तुम्हारे सौदे पर निर्भर करेगा
साथ ही तुम्हारी बिरादरी की
जनसंख्या और सजगता पर।
फिर भी नाम तो होगा ही
यही क्या कम है।
समाज का देव वर्ग
अपने कर्मों- कुकर्मों से
सुविधा भोगते रहे, ऐश करते रहे
उनकी इस व्यवस्था में खलल पड़ी तो
तड़फड़ा उठे,
उन्हें दूसरे की व्यवस्था में खामी दिखी
अपनी उस व्यवस्था में
उन्हें दरार दिखाई देने लगी
जो उन्होंने भाई-भतीजा,
परिवार, जाति, उत्कृष्टता
और दैवत्व के कारण भरी थी।
तब योग्यता कहाँ थी
आज के पिछड़े तबके ने
जब यही कार्य किया-तो
उन्हें अपने समाज पर,
संकट दिखा।
सदियों से बगैर मेहनत के
मक्खन खाने पर,
कुहासा दिखा।
नाम होना चाहिए- चाहे गलत कर्म से।
या फिर अच्छे कर्म से।
बाजार में माल बनाये जाते हैं जैसे
वैसे ही साहित्यकार
बनाये जाते हैं- यह परंपरा है, सृष्टि की।
प्रायः बड़ा साहित्यकार- कवि, कहानीकार
मुफलिसी में जीवन जीता है
उसका नाम और सम्मान
उसके मरने के बाद होता है।
यह इतिहास रहा है।
फिर उसके नाम पर पुरस्कार दिया जाता है
भले ही उसे किसी पुरस्कारं के काबिल
उसके जीते जी में न समझा गया हो-
कबीर, मार्क्स, मुक्तिबोध, निराला।
आलोचक और सम्पादक
खुद के कवि, कहानीकार, व्यंग्यकार गढ़ते हैं
हैं, घोषित करते हैं, बनाते हैं
अमुक कवि के फला आलोचक
और उनके प्रिय संपादकगण
धन दीजिए, जन लीजिए
पुस्तकें छप जाएँगी
जिसे चाहा उसे उठा दिया
और जिसे चाहा उसे गिरा दिया।
पूरे शिद्दत से गुणगान किया
सोहर गाया
पूरी लगन से मट्टी पलीद किया।
क्योंकि संस्थान से जुड़ा नहीं या वो
मौका मिला- नौकरी दिला दिया
बन गये प्रोफेसर।
शर्त हो कि वो शख्स की पहले जाति मिलती रहे
फिर तो यह जुमला तैयार ही है
कि योग्य तो रहा होगा
तभी उसे नौकरी मिली
भले ही न्यूनतम योग्यता ही सही।
रही-सही कसर उसकी विशाल जाति पूरी कर देगी।
फिर दो चार रचनाओं से
रचनाकार बना दिया जाएगा।
बशर्ते चाटुकारिता में अव्वल हो
योग्यता तो धीरे-धीरे ही आ जाएगी।
और न भी आ पाई
तो कोई क्या कर लेगा
धीरे-धीरे सब भूल जाएँगा
दो-चार दिनों बाद।
बाहर बैठा रचनाकार, अभ्यर्थी
यह मान लेगा कि मैं अयोग्य था,
नसीब नहीं था,
मैं इसमे हो सकता है
और बड़ा साहित्यकार।
किंतु जब वह बनता है
उसका नाम होता हे
तब तक तो वह मर चुका होता है
खुद से, समाज से, परिवार से,
लोग गालियाँ देते हैं, हसीं उड़ाते हैं।
उसकी असफलताओं पर।

विश्व दीपक 
शोधार्थी, हिंदी विभाग 
इलाहबाद विश्वविद्यालय 

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