ग़ज़ल-एक भोंरा गुलबदन को चूम कर फिर उड़ गया

एक भोंरा गुलबदन को  चूम  कर  फिर  उड़  गया |
एक भोंरा था जो  जिद्दी  गुलबदन पर  अड़  गया ||

हम भला रोने लगे  क्यों  इक  मुसाफिर  था  गया |
वो तो झोंका था हवा का आँख  में कुछ  पड़  गया ||

इश्क  में  महबूब   की  खातिर  ज़माने  से   लड़े |
कौन माँ का लाल है जो  माँ की खातिर लड़  गया ||

बंद  बोतल  में  भरा  हो या  नदी  की  गोद  में |
वो तो गंगा जल ही क्या जो थम गया जो सड़ गया ||

जान की  होती  है  कीमत  और  तो सब  ख़ाक है |
जब फ़ना होना तो क्या फिर सर गया की धड़ गया ||

बोर  आया  जिन्दगी  का बाग़  फिर  महका  किये |
वख्त  की  आंधी चली  औ  बोर था  जो झड़ गया ||

क्या  करे  कोई  पढाई  इल्म  कोई  या  कि  फन |
जिन्दगी  से ले  सबक  ‘आलोक’  जब  से  रड़ गया ||

अनंत आलोक
साहित्यलोक, ददाहू जिला सिरमौर, हिमाचल प्रदेश

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