दस्तक

अजीब है ये इन्तज़ार भी
मालुम है तुम कभी वापस नहीं लौटोगे 
तुम मौसम तो नहीं 
जो हर बार अपने वायदों को
निभाने लौट आता है
तुम मेरे लिये सख्त शख्स भी नहीं
ना ही मैं वक़र तुम्हारे लिये!
फिर भी मेरी शिथिल आँखें 
इन्तज़ार करती है 
हम दोनों की 
रंजिशों की उन सड़कों पर 
शायद तुम रंजिश करते करते थक जाओ फिर तुम इश्क के बाग में दस्तक देने आयोगे 
मोहब्बत के तमाम दस्तावेजों के साथ
मेरे अकेलेपन की सांय सांय को महसूस करने...

विभा परमार 
बरेली 

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