ग़ज़ल- बस तुम्हारी ही कमी है और बाकी ठीक है

बस तुम्हारी ही कमी है और बाकी ठीक है 
दिल-मुहल्ले में ग़मी है और बाकी ठीक है I

तर्के-ताल्लुक़ है हमारे और उनके दरमियाँ
रात थोड़ी शबनमी है , और बाकी ठीक है I

तिश्नगी का हाल है कि हम समंदर पी चुके 
और बाकी तिश्नगी है और बाकी ठीक है I

अब मुहब्बत में किसे दिल की लगी से वास्ता 
दिल्लगी ही दिल्लगी है और बाकी ठीक है I

तीन दिन तो उलझने हैं एक दिन में ग़म-ख़ुशी 
चार दिन की ज़िन्दगी है और बाकी ठीक है I

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

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