ग़ज़ल- या तो चाहत इश्क़ में थी या खुदा पाने में थी

या तो चाहत इश्क़ में थी या खुदा पाने में थी
इक समंदर सी तमन्ना आँख के दाने में थी

होश के इस फैसले से क्या मुझे हासिल हुआ
ज़िन्दगी की हर ख़ुशी छोटे से पैमाने में थी

सांस लेता है ये जाने कौन किसका जिस्म है
ज़िन्दगी तो अपनी तेरे गम के वीराने में थी

ये नहीं हासिल हुआ या वो नहीं मुमकिन हुआ
कशमकश ये हर घडी इस दिल को थर्राने में थी

बेगुना ही एक जिद इक़बाल जब तेरी ख़ुशी
और मेरी हर सजा तेरे बिछड़ जाने में थी

सुर में रोने का हुनर हम को सीखा देता कोई
दर्द सी ही बेकरारी दर्द को गाने में थी

हौसला गिरने लगा है अब तेरे ‘अहसास’ का
किस कदर की बेबसी खुद का पता पाने में थी

मनोजअहसास
सुधासदन, धीमाननिवास, महादेवमंदिर
पोस्टनकुड
जिलासहारनपुर

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