ग़ज़ल- अगर कहीं भी बंधु, चिरागों पर चर्चा हो।

अगर कहीं भी बंधु, चिरागों पर चर्चा हो। 
भव-भूतल के बिसरे कोनों पर चर्चा हो। 

व्यर्थ विलाप, निराशा, रुदन, विसर्जित करके  
लक्ष्य-साधना, कर्म, हौसलों पर चर्चा हो। 

सुमन सभी, खुश-रंग सुरभि, देते बगिया को 
नहीं ज़रूरी, सिर्फ गुलाबों पर चर्चा हो। 

नाम हमारा भव में, चर्चित हो न हो मगर 
चाह, कलम के,  अमृत-भावों पर चर्चा हो। 

सार जहाँ हो, ज्ञान-सिंधु की बूँद-बूँद में 
ऐसी सरल, सुभाष्य किताबों पर चर्चा हो। 

छोड़ो भी, अब नीरस जीवन का नित रोना 
रसमय, गीत, ग़ज़ल, कविताओं पर चर्चा हो। 

बेदम हो जब भूख, रोटियाँ घर-घर पहुँचें 
तभी आसमाँ, चाँद-सितारों पर चर्चा हो। 

सदी कह रही सुनो ‘कल्पना’ समय आ गया 
बेटों से रुख मोड़, बेटियों पर चर्चा हो।


कल्पना रामानी 
ईमेल -kalpanasramani@gmail.com

0 comments:

Post a Comment