जब याद तुम्हारी आती है!

जब रातों को तुम्हारी याद सताती है,
मेरी नींद उड़ जाती है,
मैं हरपल यही सोचती हूँ,
मैं तुमको ना पा सकी,
रहती हूँ मैं बिस्तर के,
एक कोणे में डुबकी सी,
पर हरपल तुम्हारा अभास,
पूरे बिस्तर पर पाती,
कभी चादर पर,
तो कभी तकीये में,
कभी दीवारों की रंगो में,
तो कभी खिड़की के लहराते परदों पर,
तो कभी सामने पड़े आइने में,
सिर्फ तुम्हारी छवि नजर आती,
कभी तुम्हारे सीने से लिपट जाती हूँ,
चूमती हूँ बार-बार,
तो कभी तुमसे रूठ कर
रोने लगती हूँ,
तो कभी गुस्सा का बहाना करती हूँ,
ताकि तुम प्यार से मनाओं मुझे,
मैं सोचती हूँ काश तुम बच्चे होते,
देती तुमको अपना लाड़, दुलार और प्यार
लेकिन तुम दो टांगो वाले,
आजाद ख्यालात के पक्षी हो,
कहाँ मेरी प्यार के कैद में आनेवाले,
तुम अपनी चाहत की आजादी चाहते हो,
तुमको मेरे सपनों की नहीं,
अपने ख्वाईशों को रंग भरने की चाहत है,
तुम कहाँ हो मैं कहाँ हूँ,
तुम्हारा पास आना मुमकिन नहीं, 
ना मेरा तुम्हारे पास जाना,

इसलिए मैं सपनों में तुमकों
अपने पास बुलाती हूँ,
ताकि मैं तुमको जी भर के प्यार कर सकूँ।

कुमारी अर्चना
शोधार्थी, राजनीतिशास्त्र विभाग
भागलपुर विश्वविद्यालय, बिहार

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