ग़ज़ल- किसी की ज़ुल्फ़ सुलझाने में गुम हूँ

किसी की ज़ुल्फ़ सुलझाने में गुम हूँ 
ज़रा ठहरो मैं अब वापस आ रहा हूँ 
लायक कहाँ की मुस्कुराऊँ!!
मगर मैं जख्म को सहला रहा हूँ!!
बहुत है,
मैं खुद को बस यूंही बेहला रहा हूँ!!
न दे अब,
गुजिश्ता क़र्ज़ को सुलझा रहा हूँ!!
उस जुर्म की मैं पा रहा हूँ!!
अब पाचुका हूँ इतनी शोहरत,
कि उस शोहरत को अब दफना रहा हूँ!!

हाफ़िज़ अब्दुल रशीद
पाली, हरदोई, उत्तर प्रदेश

1 comment:

  1. दवा असर न करे तो नज़र उतारती है, माँ है वो जनाब कहाँ हार मानती है ? माँ के लिए मैं क्या लिखूँ, माँ ने खुद मुझे लिखा है ! माँ का दिल कैसा होता है यह जानने के लिए पढें मेरी यह छोटी सी कहानी – “माँ का दिल” !
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