मैं झरना चाहती हूँ!

झड़ रहे पेड़ों,
झड़ रहे फूल,
झड़ रहे फल,
झड़ रहे पर्वत,
झड़ रहे पहाड़,
झड़ रहे चट्टान,
झड़ रही धारा,
मैं भी झरना चाहती हूँ, 
तुम पर,
सदा के लिए
तुम्हारी बनी रहने के लिए............

कुमारी अर्चना
शोधार्थी, राजनीतिशास्त्र विभाग
भागलपुर विश्वविद्यालय, बिहार

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