नरेश मेहता के उपन्यास साहित्य में राजनैतिक चेतना

       साहित्य सदैव समाज का पथ प्रदर्शन करता रहा है। साहित्यकार ने समाज के सामने आदर्श एवं नैतिक मूल्यों का उद्घाटन किया है तथा देश और समाज को सुसांस्कृतिक चेतना प्रदान की है। प्राणी मात्र के मानस पटल पर राष्ट्रीयता की भावना को सुदृढ़ एवं व्यापक स्वरूप प्रदान किया है। वह युगीन परिस्थितियों को साहित्य में व्यक्त करता है। साहित्य मानव जीवन एवं समाज की अभिवृतियों एवं अनुभूतियों का प्रतिरूप होता है। ‘‘भारत में राष्ट्रीय चेतना का आरंभ 1835 की मैकाले की शिक्षा नीति के साथ माना जाता है। मैकाले की शिक्षा नीति ने भारतवासियों को पाश्चात्य शिक्षा, संस्कृति और मूल्यों से परिचित करवाया। स्वतंत्रता, समानता और अभिव्यक्ति का खुलापन जन्म लेने लगा। अतः हमारा साहित्य भी राष्ट्रीय चिंतन से प्रभावित होने लगा। भारतेन्दु ने अपने लेखों तथा नाटकों के द्वारा राष्ट्रीय और राजनीतिक चेतना का प्रसार किया, तो महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उन्हें ‘सरस्वती’ के माध्यम से नया आयाम प्रदान किया।’’1 मुंशी प्रेमचन्द ने अपने ‘रंगभूमि’ और ‘कर्मभूमि’ जैसे उपन्यासों तथा कहानियों में तत्कालीन राजनीतिक स्थितियों को अपने पात्रों के मुख से उभारा। मैथिलीशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, सुभद्रा कुमारी, दिनकर, यशपाल, नरेश मेहता जैसे अनगिनत साहित्यकारों ने इस क्रम में महत्वपूर्ण कार्य किया है। साहित्यकार राजनीति से सर्वथा पृथक नहीं हो सकते। 

        आज व्यक्ति के जीवन में राजनीतिक प्रभाव बहुत अधिक बढ़ गया है। राजनीति व्यक्ति के क्रियाकलापों तथा उद्देश्यों की पूर्ति में विशेष योगदान देती है। समाज की उन्नति या अवनति में राजनीति की महत्वपूर्ण भूमिका है। मध्यवर्ग, जो समाज का एक अभिन्न अंग कहा जा सकता है कि वर्तमान संकटपूर्ण कारूणिक स्थिति तथा दर्दनाक परिणामों के लिए वर्तमान राजनीतिक स्थिति जिम्मेदार है। आज राजनीति विभिन्न विसंगतियों का समुच्चय बनकर रह गयी है। राजनीति ने मध्यवर्गीय समाज में प्रवेश करके विषाक्त बना डाला है। श्री नरेश मेहता के उपन्यासों में तत्कालीन भारतीय राजनीति, भ्रष्ट प्रशासन प्रणाली, ब्रिटिश राजनीति, राजनैतिक भ्रष्टाचार, नेतागण, आंदोलन तथा रिश्वतखोरी जैसी विसंगतियों का चित्रण किया है। जहां राजनीति के दलदल में फँसे मध्यवर्ग के वास्तविक स्वरूप को चित्रित करने का सफल प्रयास किया है। वहीं भारतीय जनता के आक्रोश और राष्ट्रीय चेतना को भी स्पष्ट किया है।

        भारतीय समाज में राजनीति का महत्वपूर्ण स्थान रहा है और मध्यवर्ग उसी समाज का एक हिस्सा है। समाज में व्याप्त राजनैतिक विचारधारा या घटना का प्रभाव मध्यवर्ग पर भी उतना ही होगा जितना अन्य वर्गो पर। भारत में राजनीति अंग्रेजी शासन की प्रतिक्रिया के रूप में प्रभावी हुई। अंग्रेजी शासन से त्रस्त जनता आंदोलन करने पर उतारू थी। अंग्रेजों की अत्याचार पूर्ण नीति के कारण विभिन्न आंदोलन, सभाएं, जुलुस, हड़तालें की जा रही थी। जो राष्ट्रीय भावना समाज में दिखाई दे रही थी उसे भारतीय कांग्रेस ने पल्लवित किया। अंग्रेजी शासन से मुक्ति की भावना। समाजवादी विचारों तथा क्रांतिकारी कार्यों ने भी स्वतंत्रता की भावना को विकसित करने में योग दिया। स्वतंत्रता की दौड़ में महत्वपूर्ण भूमिका मध्यवर्ग की रही। भारतीय मध्यवर्ग आरम्भ से ही अंग्रेज नीति का विरोधी रहा। फलस्वरूप सर्वाधिक शोषण और कुपोषण का शिकार भी मध्यवर्ग को ही होना पड़ा। तथापि मध्यवर्ग पीछे नहीं हटा। मध्यवर्गीय लोगों ने बढ़-चढ़ कर गांधीजी के आंदोलनो में भाग लिया। जेल यात्रा, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, खादी प्रेम, जुलूस, कांग्रेस की सभाओं में जाना आदि कार्य प्रारंभ हो गये थे। मध्यवर्गीय स्त्रियों का भी घर की चार दीवारी लांघकर बाहर जाना, विभिन्न राजनीतिक कार्यों में भाग लेना आदि कितने ही कार्य मेहताजी ने अपने उपन्यासों में स्पष्ट किये है। ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध भारतीय जनता में उत्पन्न असंतोष को उपन्यास में देखा जा सकता है। 

        अंग्रेजी शासन का कठोर नियंत्रण क्रूर नीति का दृश्य मेहताजी के उपन्यास ‘यह पथबन्धु था’ में स्पष्ट दृष्टिगत होता है। भारतीय आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेज सरकार ने कठोर से कठोर कदम उठाये। ब्रिटिश साम्राज्य का लोगों में भय पैदा हो इसलिए पुलिस ने अपना रौब जमाना शुरू कर दिया था जहां भी जनसमूह एकत्रित दिखाई देता था वही पुलिस का अत्याचार प्रारंभ हो जाता था। पण्डित मदनमोहन मालवीय एक जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। ‘‘अभी भाषण चल ही रहा था कि पुलिस के दस्तों ने घुस कर लाठी चार्ज कर दिया। लोग भागने लगे। नारे यहाँ-वहाँ टुकड़ों में सुनाई देने लगे, जैसे चिडि़या उड़ रही हो। पुलिस की सीटियाँ चारों तरफ सुनाई देने लगी। पुलिस ने धरपकड़ शुरू कर दी। लोग पकड़-पकड़ कर ट्रकों व लारियो पर लादे जाने लगे।’’2 एकत्रित भारतीय समूह ब्रिटिश सरकार के लिए खतरनाक हो सकता है इस भय के कारण पुलिस एकत्रित समूह पर लाठी चार्ज करती।

        स्वतंत्रता की भावना भारतीयों में बहुत अधिक मात्रा में दिखाई दे रही थी। अंग्रेजी शासन के प्रति विद्रोह की भावना जाग्रत हो चुकी थी। ‘‘अनन्त जनसमूह बढ़ रहा था। दिशाहीन। असंख्य पैरों की आवाज घुटी-घुटी सी उठ रही थी। लाखों नर-नारी बच्चे-बूढ़े, स्कूली बच्चे, व्यापारी, ठेले वाले, ऐतिहासिक, अभिव्यक्ति की महान शक्ति जनता-धोती में, पाजामे में, कुरते में, कमीज में, नंगे सिर, दुपल्ली में, पान खाये सिगरेट पीते दम साधे, गुस्से में, मुटिठयाँ ताने बढ़ रही थी। कहाँ, किधर, कौन जानता था? चौक की कोतवाली के सामने पुलिस की टुकडि़याँ तैयार खड़ी थी। अनन्त सिरों के बीच राष्ट्रीय तिरंगा धीमे-धीमे चल रहा था।’’3 राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बोध जनता में जाग रहा था परन्तु पुलिस का कठोर रूख उन्हें तोड़ने की कोशिश में लगा था। ‘‘पुलिस की सीटियाँ जन समूह का गीत भरा कंठ। शोलों की तरह उठते हुए नारे नेतृत्वहीन ऐतिहासिक बल। दिशाहीन संगीत।भारत माता की जय !! और देखते ही देखते गिरफ्तारियाँ। लाठी चार्ज। भीड़। भाग दौड़।’’4 पुलिस जैसे ही कोई जुलूस देखती तुरन्त चौकन्नी हो जाती और भयभीत होकर अपना दमनचक्र प्रारम्भ कर देती। अंग्रेजी प्रशासन का दमनचक्र इतना क्रूर था। ‘‘पूरा देश देखते ही देखते एक बड़ा सा कारागार बन गया। हजारों आदमी प्रतिदिन गिरफ्तार होने लगे। जैसे-जैसे गिरफ्तारी होती, आंदोलन की ज्वाला वैसे ही वैसे अधिक फैलती जाती। इतना बड़ा ज्वार हो जाएगा इसकी किसी को कल्पना नहीं थी। गाँव-गाँव तक आंदोलन की चिनगारी फैल गयी थी।’’5 भारतीय हर स्थिति में हर कीमत पर स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहते थे। पूरे राष्ट्र में आजादी की जंग छिड़ चुकी थी। इसीलिए युवा वर्ग अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार था। ‘‘कोने-कोने से असंख्य नवयुवक अपने प्राणों को होम करने के लिए स्कूलों, कालेजो से बाहर निकल आये और ऐतिहासिक ज्वार में समर्पित हो गये। लगा कि जैसे देश मुक्त होने के लिए कटिबद्ध है। बड़े व्यापक पैमाने पर सरकारी इमारतों, चीजों को लूटा जाने लगा, जलाया जाने लगा। थाने, रेल, तार, डाक, पुल नष्ट किये जाने लगे। सन् 1942 का यह आंदोलन क्रांतिकारी हिंसा तथा कांग्रेसी अहिंसात्मक जनबल दोनों के एकीकरण का सम्मिलित स्वरूप था।’’6 प्रभावस्वरूप अंग्रेज सत्ता काँप उठी थी। भारतीयों में अपने राष्ट्र के प्रति चेतना पूर्ण रूप से जाग्रत हो चुकी थी। मेहताजी के साहित्य में स्थान-स्थान पर भारतीय जनता में उत्पन्न आक्रोश दिखाई देता है। अंग्रेजी साम्राज्य के प्रभाव स्वरूप भारत में राष्ट्रीय चेतना विकसित हुई। अंग्रेजी शासन की क्रूर और अत्याचारपूर्ण नीति ने समाज में जन चेतना जाग्रत कर दी। अंग्रेज सरकार ने अपने स्वार्थ के लिए जो परिस्थितियाँ उत्पन्न की जिससे राष्ट्रीय भावना स्वतः ही विकसित होती चली गई। अंग्रेजो की नौकरशाही, शिक्षित मध्यवर्ग तथा औद्योगिक प्रणाली आधुनिक संसाधनों का प्रचलन, नवीन अर्थव्यवस्था आदि के कारण भारतीय राष्ट्रीयता को मजबूती मिली।

        शिक्षा के प्रसार के कारण जब मध्यवर्गीय शिक्षित लोगों ने देश की दयनीय दशा के कारणों पर विचार किया तो महसूस किया कि अंग्रेजी शासन उदारवादी न हो कर शोषणात्मक शासन हैं तो उन्होंने भारतीय जनता में राष्ट्रीय चेतना की भावना जगाई। चारों ओर अंग्रेजी शासन से मुक्ति प्राप्त करने की लालसा नजर आ रही थी। लोगों में अपने राष्ट्र के प्रति जो चेतना जाग्रत हुई थी उसी के परिणामस्वरूप भारत में विविध आंदोलन, सत्याग्रह आदि हुए। ‘यह पथबन्धु था’ उपन्यास में राष्ट्रीय चेतना का चित्रण किया गया है। ब्रिटिश प्रशासन ने जो नीति अपना रखी थी वह अत्याचारपूर्ण व क्रूरतम थी। आंदोलन प्रारंभ करने वाले नेताओं को गिरफ्तार करने के लिए उन्होनें विविध अभियान चला रखे थे। ‘‘एक पुलिस वाला कहने लगा कि शफीउल्ला क्रांतिकारी है इसी इन्दौर का है। और साहब। यह भी कि हम जानते हैं और बताते नहीं है इसलिए चौबीसों घण्टे पुलिस यहाँ तैनात रहती है। कि कौन आया, कौन गया।’’7अंग्रेजी प्रशासन को जिस पर भी शंका होती पुलिस उस कस्बे या शहर को घेर लेती।

        फिर भी राष्ट्र प्रेम की भावना कम नहीं होती। स्वराज्य प्राप्ति का भाव जाग चुका था। गांधीजी ने आंदोलन प्रारंभ कर दिया था। गांधीजी ने सोच-विचार किया यदि जनता अंग्रेजों की विरोधी हो जाए, किसी भी प्रकार से सरकार का सहयोग न करे तो ब्रिटिश साम्राज्य की नींव गिर सकती है। अतः उन्होंने अगस्त 1920 को आंदोलन हेतु चुना। ‘‘केवल राजनीति के लिए राजनीति में उनका विश्वास नहीं था और ऐसे समय में तिलक का निधन हो गया था। देश की तत्कालीन स्थिति थी, उसमें असहयोग आंदोलन सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार स्वदेशी और चरखे के उपयोग के कार्यक्रम देश के सामने रखे गए।’’8 ‘उत्तरकथा द्वितीय खण्ड’ में असहयोग आंदोलन में महिलाओं के सहयोग एवं राष्ट्रीय चेतना को दर्शाया गया है। ‘‘गांधी जयन्ती के अवसर पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का निर्णय लिया गया। प्रभात फेरियाँ निकाली गई। जिनमें स्त्रियों ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया। गांधी जयन्ती के दिन सोचा तो यही था कि होली किसी महिला के हाथों ही जलवाई जाए क्योंकि विदेशी वस्त्र एवं वस्तुएँ जितनी महिलाओं के द्वारा एकत्रित हुई थी, उसके मुकाबले पुरुषों का योग कुछ कम था।’’9 अतः स्पष्ट है कि राष्ट्रीय जागृति की भावना महिलाओं में भी उसी स्तर पर विद्यमान थी जिस स्तर पर पुरुषों में।

        अपने राष्ट्र के प्रति चेतना प्रत्येक मानस मन में जाग्रत हो चुकी थी। सभाएं, जुलूस, प्रभात फेरियाँ की जा रही थी। ‘नदी यशस्वी है’ उपन्यास में प्रभात फेरी का चित्रण किया गया है। ‘‘तोरनांद काण्ड की बात समाप्त नहीं हुई थी कि कुछ दिनों बाद कस्बे में ‘प्रभात फेरी’, सभा, शोक प्रस्ताव आदि बातों ने तहलका मचा दिया, उस दिन कस्बे में लोगों को खादी की सफेद टोपियाँ बांटी गयी। शाम को चौक में एक सार्वजनिक सभा हुई जिसमें सरदार भगतसिंह की फांसी पर रोष प्रकट किया गया तथा अंग्रेजों की भर्त्सना की गई।’’10 भारतीय जन समुदाय एक होकर ब्रिटिश शासन के प्रति अपना रोष प्रकट कर रहा था। सम्पूर्ण जन समुदाय में राष्ट्रीय चेतना की लहर दौड़ती दिखाई दे रही थी। सम्पूर्ण भारत में फेरी या जुलूस, वन्दे मातरम्, भारत माता की जय, गांधी बाबा की जय के नारे सुनाई दे रहे थे। ‘‘सबसे आगे पुस्तके साहब की पत्नी श्रीमती मालती बड़ा सा झण्डा लिए चल रही थी। स्त्रियों के पीछे विद्यार्थियों का झुण्ड था जिसका नेतृत्व कमल पुस्तके कर रही थी। उनके बाद मजदूरों का जत्था जिसमें राम सिंह सबसे आगे चल रहा था और सबसे पीछे प्रजामण्डल के कार्यकर्ता, वकील आदि थे और इसी में पुस्तकें साहब बिशनबाबू, श्रीधर आदि चल रहे थे।’’11 स्पष्ट है कि राष्ट्रीय चेतना प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक व्यक्ति के मन में दिखाई दे रही थी। 

        बीसवीं शताब्दी के आते-आते भारतीय राजनीति भी क्रमशः दो भागों में विभाजित होने लगी। मध्ययुग या सन् 1857 की तीर तलवार वाली राजाओं नवाबों की विफल राज्यक्रांति अब बम-पिस्तौल की क्रांतिकारिता में बदलने लगी थी।’’12 सम्पूर्ण भारतीय जनता अब क्रांति के बल पर स्वराज्य प्राप्त करना चाहती थी। पूरे समाज में आक्रोश विद्रोह की भावना, राष्ट्र के प्रति चेतना, स्वराज्य की भावना जाग्रत हो रही थी। जन सामान्य में राष्ट्र के प्रति जाग्रत प्रेम और अनुराग के कारण ही स्वराज्य प्राप्ति की कामना उत्पन्न हुई। फलस्वरूप जनता हिंसा और अहिंसा दोनों ही माध्यमों से राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग ले रही थी। जन चेतना के कारण ही राष्ट्रीय आंदोलनों को सफलता प्राप्त हुई तथा जनता की पूर्णरूपेण भागीदारी राष्ट्रीय चेतना को स्पष्ट करती है। 

        साहित्यकार नरेश मेहता ने उपन्यासों में जिस समय का वर्णन किया है। तत्कालीन समाज देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था। उस समय भारतीय समाज राष्ट्रीय प्रेमानुराग एवं आत्मोसर्ग की भावना से भरा हुआ था। समाज में जो साहित्य लिखा जा रहा था वह भी राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत था। साहित्य, अंग्रेजी साम्राज्य के विरूद्ध चिंगारियाँ उगलने का कार्य कर रहा था। मेहता जी ने उपन्यासों में दिखाया है कि ‘‘छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े तक देशप्रेम के भाव से आप्लावित है।’’13 ‘नदी यशस्वी है’ उपन्यास में स्वतंत्रता संघर्ष में युवा वर्ग का राष्ट्रीय प्रेम स्पष्ट दिखाई देता है। भारतीय युवा वर्ग अपने भविष्य की चिंता छोड़कर स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद गये थे। स्वतंत्रता संघर्ष में स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया अंग्रेज सरकार को हर तरह से परेशान करने का कार्य युवा वर्ग कर रहा था। ‘‘तोरनांद का डाका इन्दौर, उज्जैन घाट के कॉलेजो में पढ़ने वाले बड़े घरों के लड़कों ने देश की आजादी के लिए बम्ब पिस्तौल बनाने के लिए डाला था।’’14 अतः स्पष्ट है कि युवाओं में जो राष्ट्र के प्रति अनुराग, भक्ति, प्रेम जाग्रत हुआ उसी के कारण वे अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष हेतु प्रस्तुत हुए। 

        भारतीय राजनीति में गांधीजी के प्रवेश ने राष्ट्रीय संघर्ष को और अधिक प्रोत्साहन दिया। लोग गांधी के अहिंसावादी विचारों का समर्थन करने लगे। भारतीयांे ने गांधीजी के मार्ग का अनुसरण किया। ‘यह पथ बन्धु था’ में स्पष्ट किया गया है मदन मोहन मालवीय जी ने जनसभा को संबोधित किया। ‘‘देश की स्वतंत्रता अंग्रेजों के शासन आदि पर बोलते हुए बताया कि गांधी बाबा ने निःशस्त्र रहकर भी अंग्रेजों की चुनौती देने का यह जो नया रास्ता बनाया है वह है विदेशी माल का बहिष्कार। किस प्रकार जर्मन अपने देश का माल खरीदता है स्वयं अंग्रेज इंग्लैण्ड के माल के अलावा दूसरा माल नहीं खरीदता चाहे सस्ता ही क्यों न हो तब हम भारतीयों को भी चाहिए कि अपने ही देश का माल खरीदे। सबसे ज्यादा जो माल बाहर से आता है वह है कपड़ा। विदेशी कपड़े का व्यवहार करना छोड़ देना चाहिए देश का कपड़ा पहनने से देष के कारीगरों को रोजी-रोटी मिलेगी देश का पैसा देश में ही रहेगा ऐसी स्थिति में हमारी आर्थिक स्थिति सुधरेगी।’’15 अतः विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर, स्वदेशी वस्तुओं को अपनाकर राष्ट्र प्रेम अभिव्यक्त किया गया है। 

        भारतीय जनता में स्वदेशाभिमान जाग्रत हो रहा था सभी स्वदशी अपनाने लगे थे तथा विदेशी वस्तुओं की होलियां जलाई जा रही थी। गांधी जी ने हस्त निर्मित स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर बल दिया। स्वदेश निर्मित खादी वस्त्रों के उपयोग पर बल दिया गया। सामूहिक रूप से चरखा कातने का कार्य किया जाने लगा। स्वदशी अपनाने तथा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार में महिलाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। ‘‘और असहयोग आंदोलन के समय ही अब प्रिंस ऑफ वेल्स भारत आए और मुम्बई आदि सभी जगह विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई तो पुलिस की ज्यादतियों के विरोध में कहीं-कहीं आंदोलन हिंसात्मक हो उठा। इसकी पराकाष्ठा चौरी-चौरा का थाना जला देने पर हुई। गांधी ने इतना बड़ा आंदोलन जब वापिस ले लेने की घोषणा की तो देश के सभी नेताओं ने न केवल निन्दा ही की बल्कि उनका मजाक तक बनाया, पर गांधी अडिग रहे।’’16 स्पष्टतः सम्पूर्ण भारत गांधी जी के साथ था। राष्ट्र के प्रति लोगों के कर्तव्य को जाग्रत करने के लिए विविध सभाओं, प्रभात फेरियों का आयोजन हो रहा था। लोगों में राष्ट्र प्रेम, स्वाभिमान की भावना को जाग्रत करने के लिए जोशीले भाषण दिये जा रहे थे। राष्ट्रीयानुराग की भावना जन-जन में आक्रोश भर रही थी। मध्यवर्ग भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए कटिबद्ध था भारतीय नेता ‘भारत छोड़ो’ का नारा लगाते एक साथ गिरफ्तारियाँ दे रहे थे। लोगों में देश के प्रति अनुराग और स्वाभिमान जाग चुका था। पूरे देश में तहलका मचा हुआ था। ‘‘भीड़ नारे लगाती हुई जगह-जगह एकत्रित हो रही थी -

- भारत छोड़ो!! 

- भारत माता की जय!! 

- नहीं रखना नहीं रखना, सरकार जालिम नहीं रखना!!

- यह भूरा बन्दर नहीं रखना!!

- नहीं रखना, नहीं रखना!!

- इन्कलाब जिन्दाबाद!!

- महात्मा गाँधी जी जय!!’’17

चारों ओर शोर ही शोर, नारे ही नारे सुनाई पड़ रहे थे सम्पूर्ण भारतीय जनता स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए लालायित थी। लाखों लोग बच्चे, बूढ़े, नर-नारी सभी व्यापारी, नौकर सम्पूर्ण जनसमूह एकत्रित होकर स्वतंत्रता संघर्ष में उतर गये। ‘‘एक हिलोर उठती और एक जिला सुलग उठता। और इस प्रकार आंदोलन अनन्त लहरों में हिलोरें ले रहा था।’’18 मध्यवर्ग ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राष्ट्र के प्रति आत्मोत्सर्ग करने में देश के प्रत्येक व्यक्ति ने अपना योगदान दिया। राष्ट्रानुराग की भावना को मेहता जी ने उपन्यासों के माध्यम से सफल रूप में व्यक्त किया है। राष्ट्र का प्रत्येक वर्ग, समुदाय तथा सम्पूर्ण समाज स्वतंत्रता की लड़ाई में पूर्ण रूपेण संलग्न था। अपने देश के प्रति अपने कर्तव्य का बोध, राष्ट्र प्रेम, भक्ति, स्वाभिमान, जन मानस में दिखाई दे रहा था। तत्कालीन परिस्थितियों से उपजे राष्ट्रानुराग और राष्ट्र के प्रति अभिमान को मेहता जी ने उपन्यासों में स्पष्ट रूप से अभिव्यक्ति प्रदान की है। 

निष्कर्ष:

वर्तमान शासन व्यवस्था और राजनैतिक परिवेश को लेकर उपन्यासों में सर्जना होती रही है। श्रीनरेश मेहता ने उपन्यासों में तत्कालीन राजनीतिक गतिविधियों का यथार्थ चित्रण किया है। मेहता जी के उपन्यास स्वतंत्रता से पूर्व पीठिका पर आधृत है। देश स्वतंत्रता प्राप्ति की पुरजोर कोशिश में संघर्षरत था। ब्रिटिश साम्राज्यवाद की विविध नीतियों के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुए मध्यवर्ग की इस संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका रहीं। समाज में फैले भ्रष्टाचार, शासन की स्वार्थपरता तथा शोषण को देखकर लोगों में चेतना जाग्रत हुई। जहां एक ओर स्वतंत्रता प्राप्ति की ज्वाला सुलग रही थी वहीं दूसरी ओर भारतीय राजनेताओं की स्वार्थी प्रवृति जनता में असंतोष पैदा कर रही है। स्वार्थवश राजनेता एवं ब्रिटिश प्रशासनिक कर्मचारी समाज में साम्प्रदायिकता का विष घोल रहे थे। ऐसे में मध्यवर्ग इन सब से रूष्ट होकर समाज में क्रांति का अग्रदूत बनकर सामने आया। राजनैतिक कार्यों, गतिविधियों में भाग लेने वालों में सर्वाधिक संख्या मध्यवर्ग की रही। मध्यवर्गीय पात्रों के माध्यम से मेहता जी ने समाज के समक्ष आदर्श स्थापित किये। जिन्होंने जनचेतना में महती भूमिका निभायी। अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि राष्ट्र प्रेम, अभिमान का भाव प्रत्येक मानस में सदैव विद्यमान रहता है बस उसे जगाने के लिए समय, परिस्थिति उत्पन्न होनी चाहिए। और वह परिस्थितियाँ अंग्रेजों ने भारत में पैदा की परिणामस्वरूप उन्हें मूंह की खानी पड़ी। सम्पूर्ण भारत की जनता ने एकता का प्रदर्शन किया और संघर्ष कर अंग्रेजों को भारत से खदेड़ बाहर किया। यही देशानुराग और देशाभिमान भारतीयों को स्वतंत्रता दिलवाने में बहुत सहयोगी साबित हुआ। 

सन्दर्भ -

  1.  कविता भट्ट, उपेन्द्रनाथ अश्क के उपन्यासों में मध्यवर्ग, क्लासिक पब्लिकेशन, जयपुर 2003, पृष्ठ संख्या 136
  2. यह पथबन्धु था, नरेश मेहता, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या429
  3. वही, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 429
  4. वही, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 430
  5. वही, पृष्ठ संख्या 431
  6. वही, पृष्ठ संख्या 431
  7. वही, पृष्ठ संख्या 287
  8. उत्तरकथा द्वितीय खण्ड, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 162
  9. वही, पृष्ठ संख्या 443
  10. नदी यशस्वी है, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 229
  11. उत्तरकथा भाग-2, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 237
  12. वही, पृष्ठ संख्या 152
  13. कविता भट्ट, अश्क के उपन्यासों में मध्यवर्ग, क्लासिक पब्लिकशन, जयपुर 2003, पृष्ठ संख्या 13
  14. नदी यशस्वी है, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 224
  15. उत्तरकथा द्वितीय खण्ड, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 162
  16. वही, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 162
  17. यह पथबन्धु था, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 547 
  18. वही, पृष्ठ संख्या 550

रेखा सैनी (जे. आर. एफ.)
शोद्यार्थी, हिन्दी विभाग
वनस्थली विद्या पीठ
निवाईटोंक, राजस्थान

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