रूंआंसे लफ्ज़

बारिश सी छलक रही है ये आँखें 
इन्तज़ार करके 
फिर सोचने लगी कि, 
तुम तो अकड़ हो पेड़ के जैसे 
कहां झुकोगे,
जिसमें ना तो शाखाएँ और ना ही पत्तियाँ है
कांटे सा दिल है ना तुम्हारा अगर 
लगा भी तो सिर्फ़ चुभन का अहसास देगा
सेहरा हो तुम 
जहां सिर्फ़ खामोशी के कण और 
नागफनी सी भावनाएँ ज़िन्दा है
जिनका शायद ही कोई ख्याल रखे!

विभा परमार 
बरेली

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