'हम ही हटायेंगे कोहरा' की समीक्षा

पुस्तक का नाम : हम ही हटायेंगे कोहरा
कवि : असंग घोष
प्रकाशक : सानिध्य बुक्स, एक्स/3282, गली नंबर चार, रघुबरपुरा नं –2
गांधीनगर, नई दिल्ली
मूल्य : 150 रूपये मात्र
कुल पृष्ठ : 96
प्रकाशन वर्ष : 2016

असंग घोष उत्पीड़ित समुदायों के आत्म इतिहास में ऐसे विरल कवि हैं जो कविता का एक नया प्रदेश बनाते हैं. वे एक ऐसा जनपद बनाते हैं जहाँ उत्पीड़न न्यूनतम हो. उनकी कविता में रैदास के बेगमपुरा की संकल्पना आप सहज देख सकते हैं. कविता के भोंथरे पड़े प्रतिमानों से उनकी कविता का आस्वाद हो सकता है किसी आलोचक को कम भाये, हो सकता है कोई अलंकारवादी, रसवादी कविता को लेकर अपनी स्थापनाओं से कविताओं को नकार दे. हो सकता है कविता के नए प्रतिमानों में, दूसरी परम्परा के कैननों में उनकी कविता को फिट करना कठिन हो. पर उनकी कवितायें इन प्रतिमानों की सीमा रेखा से परे की कवितायें हैं.
वे एक नए सौंदर्यशास्त्र के साथ कविता के इतिहास में पिछले दो दशकों में टिके हुए हैं. आज कविता के वही प्रतिमान नहीं हैं जो कालिदास या बाणभट्ट की कविताओं के हुआ करते थे. कविता के वही कैनन नहीं है जिसमें आसुग ने बाहुबली रास, नरपति नाल्ह ने बीसलदेव रास, जायसी ने ‘पद्मावत’ लिखा था. कबीर की कविता के प्रतिमानों को आज हम हुबहू लागू नहीं कर पायेंगे. उनकी उलटबासियाँ आज के मनुष्य की समझ से बाहर हैं. आज गुरु और गोविन्द में से गुरु और गोबिंद किसी को नहीं चुनना है. सब अर्थ आधारित तंत्र ने हथिया लिया है. आज तो मान्यवर कांशीराम के शब्दों में ‘गुरुकिल्ली’ की जरुरत है. कविता में उसी गुरुकिल्ली का प्रतिमान स्थापित कर रहे हैं असंग घोष.
बहुत आगे कहाँ जाएँ सत्तर के दशक की कविताओं और असंग घोष की कविताओं में अंतर है. कविता का पहनावा ओढ़ावा पहले जैसा नहीं है. बहुत सारे कैनन बने हैं, बहुत सारे मठ टूटे हैं, कई प्रतिमान भरभराकर गिर रहे हैं पर कविता शाश्वत है. उसकी अंतर्वस्तु में कोई बहुत अंतर नहीं पड़ा है. उपन्यास तो मध्यवर्ग तक आया पर कविता लम्बे कालखंड तक सामंती हाथों में रही. अभी उसका रूप संवर रहा है. कविता अब उन्हीं उत्पीड़ितों के हाथ में आयी है जिसमें लिखा गया था ‘लोहे का स्वाद लुहार से नहीं, उस घोड़े से पूछो जिसके मुँख में लगाम है’. आस्वाद की जगह आज स्वाद कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. अब कोई कविता काव्य है कला? कला है अथवा जीवन ? कविता क्या है ? से बहुत आगे निकल गई है. उसी आगे की धारा में निकले हुए कवि हैं असंग घोष.
हम और हमारा समाज भले ही तीसरी सदी में जी रहा हो, पर हम उत्तरआधुनिक होने को लालायित है. ऐसा लगता है बाजार की शक्तियां केवल भारत को लील रही हैं और कविता उसके आगे लाचार है. कविता लाचार हो सकती है, अब उत्पीड़ित लाचार नहीं हैं. वंचितों के मुख में आवाज आयी है. अब उन्हें उनके लिए किसी बोलने वाले की जरुरत नहीं है. वे लिख पढ़ और गा रहे हैं. कविता में वे गहन पीड़ा को अभिव्यक्त कर रहे हैं. कलावादियों को उन्होंने धकेल दिया है. आस्वाद को साधारणीकरण तक ले आये हैं. उनके अन्दर रसराज ‘श्रृंगार’ नहीं ‘जुगुप्सा’‘भय’ और ‘क्रोध’ अधिक है.
आज जब कविता ‘पोइट्री मैनेजमेंट’ की तरफ बढ़ रही है. दोपदिया सिघार और तोता बाला घोष के नाम से अनाम भाषा में लिखी जाने वाले कवितायें चर्चा में हैं. वहां एक ऐसे कवि के बारे में बात करना लाजिमी है जो सब मंदिर, मस्जिद, गढ़ तोड़कर मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होने का आग्रही है. वहां एक ऐसे विरल कवि के बारे में बात करना लाजिमी है जो कविता लिखता नहीं अपितु कविता जीता है. अपने दुःख से समाज को मिलाता है. जहाँ उसे लगता है ‘सर्वम दुक्खं’. वह सोचता है ऐसी कौन सी परिस्थियाँ रही होगीं जब तथागत के मुख से यही बात निकली होगी. क्या उनका समुदायवाद असंग का समुदायवाद है? क्या संबुद्ध की पीड़ा ही असंग की पीड़ा है? तब हमें सोचना होगा कि आखिर में कविता ने अब तक क्या किया है? क्या वह आजतक आस्वाद के सहारे रही. उसने दुःख दूर करने का कोई उपक्रम नहीं खोजा. क्या वह भी ‘सर्वम दुक्खं’ की हिमायती रही?
‘हम ही हटायेंगे कोहरा’ असंग घोष का पांचवां कविता संग्रह है. इस कविता संग्रह की कवितायें अपने रूप और आकार में पहले से ज्यादा चुस्त हैं. यहाँ कवि पहले की अपेक्षा थोड़ा और सॉफ्ट हुआ है. कविता बयान मात्र नहीं रह गई है बल्कि अब उसमें थोड़ा बांकपन आ गया है. कहन वही है पर कहने का तरीका अलग है. आक्रोश का स्वर थोड़ा धीमा पड़ा है. इस कविता संग्रह में बुद्ध की अपेक्षा करुना को अधिक जगह मिली है. लोकतंत्र में कवि की आस्था थोड़ी और दृढ़ हुई है. इन कविताओं में प्रजतान्त्रिका मूल्यों के क्षरण पर शोक और करुना मिश्रित संवाद अधिक हैं. इस संग्रह की पहली कविता ‘पक्षियों को बीजा दो’ पक्षियों से अधिक कहीं मनुष्य और मनुष्यता की कविता है. निरंतर खोते जाते मूल्यों और अस्मिताओं कि चिंता आखिर कौन कर रहा है? कवि की सत्ता जितनी भी है वह प्रतिरोध के साथ खड़ा है. इस कविता संग्रह की शुरआत उसी कविता से है.
उनकी कविता ‘आज की नारी’ में स्त्री के साथ होते आये छल को कवि सहज उद्घाटित कर देता है. कवि ‘स्त्रीशूद्रोनाधीयताम’ के शंखनाद को अपनी कविता में चुनौती देता है. वह विप्र कवि तुलसी के मुख को लाल कर देता है और पूछता है कि आखिर शूद्र, पशु और नारी तुम ब्राह्मणों की दृष्टि में ताड़न के अधिकारी क्यों हैं? क्या तुम्हारी विभेदकारी सृष्टि में स्त्री का कोई स्थान नहीं? असंग प्रश्न उठाते हैं कि तुलसी तक तो ठीक है पर उन्हीं के वंशज आचार्यरामचंद्र शुक्ल और तथाकथित मार्क्सवादी आलोचक रामविलास शर्मा क्या सोचते हैं? क्या उनकी स्त्री तुलसी की स्त्री दृष्टि से कुछ अलग है. असंग मिथक को तोड़ते हैं:
इंद्र की दृष्टि से/तूने/ एक स्त्री को पथरा दिया/
ताकि वह डरी रहे हमेशा/ न करे विरोध तेरी कुटिलता और कुदृष्टियों का/
तू पाँव छूने से होने वाले/ उद्धार को गौरवान्वित मत कर/ स्त्री जान चुकी है /
ब्रह्मा, कृष्ण/ वायु/पराशर/ वृहस्पति/राजा दंड के /
मिथकों में किये अपहरण बलात्कार
(हम ही हटायेंगे कोहरा, पृष्ठ १३ )   

असंग खोती हुई परम्पराओं को लेकर चिंतित हैं. बुरी परम्पराओं को तो मिट ही जाना चाहिए पर ऐसा कभी नहीं होता कि सब बुरा ही बुरा मिटे. कभी कभी सबसे अच्छा भी मिट जाता है. नई पीढियां उन अच्छाइयों को महसूसने से वंचित रह जाती हैं. उन्हें अपने पूर्वजों का उत्पीड़न भूल जाता है. पर यहाँ कवि आश्वस्त करता कि हमें चिंतित नहीं होना चाहिए. शायद ऐसा समय की जरुरत हो. वे अपनी ‘माँ और पिता’ नामक अपनी कविता में खुद के जीवन और फिर उसके बाद अपनी पीढ़ियों का जिक्र करते हुए लिखते हैं :
आजकल के बच्चे/ बरू के बारे में जानते ही कहाँ है
वे तो एक, दो, तीन, चार, पांच, दस, बीस/ पचीस-पचास
पैसों के सिक्कों के/ प्रचलन से वंचित ही रहे/ आगे की पीढ़ियाँ तो
इन्हें जान भी नहीं पायेगी/ वैसे भी मेरा बेटा/ रांपी चलाना नहीं जानता है
यह उसने सीखा ही नहीं/ और शायद/ अब जरुरत भी नहीं
(हम ही हटायेंगे कोहरा, पृष्ठ १५)
उत्पीड़ितों की कविता में अब यही परिवर्तन है. पारंपरिक पीढियां अपने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़ रहा है. आज वह उसकी मज़बूरी नहीं है. शायद कवि भी इसी परिवर्तन को इंगित करता है कि समय के साथ बहुत सारी गर्द को साफ़ होना ही चाहिए. पीढियों को गंदी और बुरी चीजें छोडनी ही होंगी.
उदय प्रकाश की एक प्रसिद्ध कविता है ‘सूअर’ और इसी सन्दर्भ को लेकर बाबा नागार्जुन की एक कविता है ‘बारह थनों वाली’ और इसी श्रृंखला में असंग की कविता है ‘राक्षस हो जाना चाहता हूँ’ जिसमें कवि खाते पीते शताब्दी के सूअरों की बात करता है. यहाँ कई सन्दर्भों में एक निरीह पशु है सूअर जो कभी मिथक में ‘बाराह’ की तरह जाना जाता था. यहाँ पहले असंग कि कविता देखें :
खदेड़ने कि भरसक कोशिश की मैंने/ बावजूद इसके घुस आया है
खेत में अपना थूथुन उठाये/ मेरी फसल को नेस्तनाबूद करते हुआ/
जंगली सूअर/ मेरी हर कोशिश बेकार हो गई/ इसके सामने तो अब तो मुझे
इन्तजार है अपने दांतों के / तीक्ष्ण होने का
सचमुच मैं तेते मिथकों का राक्षस हो जाना चाहता हूँ
(हम ही हटायेंगे कोहरा, पृष्ठ २० )   
यहाँ देखें तो कविता के बिम्ब बदले हुए हैं. कोई सूअर जैसा निरीह और घृणित प्राणी क्यों होना चाहेगा? हर कोई शेर होना चाहता है. भाषा विभेद ने पशुओं को तो नहीं छोड़ा पर हाँ, दलित वंचित रचनाकार स्वयं को ऐसे अलंकरण से अपमानित नहीं करता अपितु उसके गुणों को ग्रहण करते हुए अपने दांत नुकीले करना चाहता है.     
आज दलित वंचित निरीह और बेचारा नहीं है. संविधान के कारण उसने अपनी शक्ति को बढ़ाया है. उसने अपनी ताकत विकसित की है. आज वह करोडपति बिजनेश मैंन भी है. आज डिक्की जैसी संस्थाओं का वह सफलतापूर्वक संचालन भी कर रहा है. आज टीना डाबी जैसी उसकी बेटियां आईएएस जैसी कठिन परीक्षाओं में टॉप कर रही हैं. आज दीपा कर्माकर जैसी दलित बेटियां भारत का मान बढ़ा रही हैं. रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या के कारण देश एक जुट हो रहा है. आज पंजाबी की युवा गायिका बाबा साहब आंबेडकर के गानों को दुनिया में फैलाकर उन्हें अमरता का पथ दे रही है. आज जाने कितने दलित ‘बंत सिंह’ हत्या और बलात्कार के बाद चुप नहीं है. आज दलित सामूहिक होकर अपनी आवाज उठा रहे हैं जो यह परिवर्तन साहित्य का भी अंग बना है. कवि असंग अपनी कविता ‘तेरा घोड़ा मेरे कब्जे में है’ में लिखते हैं :
मैं एकलव्य नहीं हूँ/ मेरा अंगूठा अपनी जगह कायम है/
न ही मैं कर्ण हूँ/ मेरा कवच/ चिरस्थायी हो चुका है
नहीं आने वाला तेरे झांसे में / तू आ लड़ मुझसे / तेरा घोड़ा मेरे कब्जे में है
(हम ही हटायेंगे कोहरा, पृष्ठ ३०)
उनकी कविता ‘बेजोड़ छल’ बने हुए मिथकों पर सीधा प्रहार करती है. सदियों से सत्ता अपने हित को साधने के लिए कैसे अपने प्रतिमान बनाती है और सत्ता की भागीदारी को सुनिश्चित करती है. कैसे वह अपनी पीढ़ियों और अपने बीजों में कुतर्क को स्थापित करती हुई शक्ति का संधान करती है. ‘हम ही हटायेंगे कोहरा’ दलित कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘ठाकुर का कुआँ’ की बरबस याद दिला जाती है.
  उनकी कविता में एक अजीब तर्कवाद है जिसमें आक्रोश बड़ी सिद्दत के साथ आता है. मलखान सिंह की कविताओं की भाषा में कवि बोलता है ‘सुनो ब्राह्मण’:
तुम बामनपारा में / घुसते हो रोज / कभी सांझ ढले
कभी अल्लसुबह/ बगल में दबा निकलते हो
अपने पोथी पतरे को / लोगों को चूतिया बनाने
(हम ही हटायेंगे कोहरा, पृष्ठ ७०)
इसी तरह से उनकी कवितायें उन ब्राह्मणवादी मूल्यों को समूल ध्वस्त कर देना चाहती हैं जिसने देश की सत्तर प्रतिशत आबादी का जीना मुहाल कर रखा है. जिसने ऊंच-नीच का भेद भाव रचा है. जहाँ मनुष्य को मनुष्य नहीं समझा जा रहा है. कवि ऐसे मनु की संहिताओं को जलाने के पक्ष में है जो विभेदकारी हैं. जिनसे सभ्य मनुष्यों को खतरा है. ‘दीमकों चाटो’ नामक कविता में कवि की कामना है कि :
कहते हैं दीमकें चाट जाती हैं किताबें
पोथी पतरा और ग्रन्थ
फिर वे क्यों नहीं चट कर पायीं
वेद, पुराण, उपनिषद और मनुस्मृति ?
बताओ तो!
(हम ही हटायेंगे कोहरा, पृष्ठ ८३)  
इसी तरह से असंग घोष अपनी कविताओं में एक महा आख्यान रहते हैं. वे उत्पीड़न का दंश झेलते हुए उत्पीड़न को नेस्तनाबूद होने का सपना संजोते हैं. इसीलिए कहीं कहीं उनकी कविता में आक्रोश मुखर हो जाता है. करुना पीड़ा को कहते कहते कलात्मक नहीं रह जाती. उनकी कविता में मनुष्य के गुणों अवगुणों की अभिव्यक्ति हो जाती है. दलित चेतना में असंग की कवितायें एक अलग सुर और साधना की कवितायें हैं.  

समीक्षक:
डॉ. कर्मानंद आर्य
सहायक प्राध्यापक
भारतीय भाषा केंद्र, हिंदी
दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय
चंदौती मोड़, विनोबा नगर, गया
बिहार – 823004
मो. +91-8092330929/8863093492/9430005835

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