बताएँ हाल कैसे हम तुम्हें दो-चार बातों में

बताएँ हाल कैसे हम तुम्हें दो-चार बातों में
गुज़रती है हमारे दिल पे कैसी चाँद रातों में 
बताएँ हाल कैसे हम तुम्हें...
कोई ख़्वाबों में गुम होगा
कोई पहलू-ए- जाँना में
कोई ख़त पढ़ रहा होगा
कोई ख़त लिख रहा होगा 
किसी की धडकनें सुनकर
किसी को राहतें होंगी
कहीं गुल खिल गए होंगे
कहीं पर चाहतें होंगी 
कहीं काँधे पे सिर होगा
कहीं ज़ुल्फ़ों में ख़म होंगे
कोई माशूके-दिल होगा 
कोई जानो-सनम होंगे...
यहाँ रानाईयों में भी 
बड़ी ही दोज़खी-सी थी 
मुक़ाबिल ही मुकद्दर था 
सुकूँ से ही ठनी-सी थी 
निगाहों से मिलन भी था 
निगाहों से बिछोड़ा भी 
उसी इक रात में सब कुछ 
गज़ब का चाँद उजला था 
मगर वो रात काली थी 
मगर वो रात काली है...
किसी की बात मत छेड़ो 
नज़ारे और टूटेंगे 
सितारों से न कहना कुछ 
सितारे और टूटेंगे 
लबालब हैं तो रहने दो 
उन्हें भी है पता लेकिन 
सहारा दीजियेगा मत 
किनारे  और टूटेंगे 
यहाँ रुखसत भी रूठी है 
क़ज़ा भी मुँह फुलाए है 
कशमकश चील-कौओं-सी 
मुसलसल नोच खाए है....
बड़ी बरबादियाँ बरपी हैं 
मेरे दिल के हुजरे पे
तवायफ़ और क्या करती 
अगर जाती न मुजरे पे 
उसी के हाल जैसे ही 
हमारे हाल भी साहिब 
“वहीं घुँघरू समय के हैं 
वही कोठा ख़ुदा का है 
ख़ुदाई माँग करती है 
तवायफ़ बन तवायफ बन 
बने बैठे हैं आखिर हम 
तवायफ़ ही तवायफ़ ही...”
चलो छोड़ो अभी कुछ और भी जुड़ना है खातों में 
बताएँ हाल कैसे हम तुम्हें दो-चार बातों में
गुज़रती है हमारे दिल पे कैसी चाँद रातों में I
बताएँ हाल कैसे हम तुम्हें...

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

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