और हक़ीक़त...

फसल जब पक जाती है 
तो वह... . 
बीड़ी सुलगाने से भी डरता है
और चुपचाप 
चार दीवारी में माचिस निकालता है 
जैसे गुनाह कर रहा हो !
सर्द रातों में 
सोने की जगह 
वह फसल रखता है 
और भाव के तार 
बुनते-बुनते 
गठरी-सा होकर 
वहीं सो जाता है !
ऊँगलियों पर...दिन गिनते-गिनते 
पोर घिस जाती हैं 
रहे-सहे दामों में 
पसीना बिकता है 
अगली फसल फिर 
उमंग लेकर बढ़ती है।
आधी आबादी....
सपने खाती है 
सपने ओढ़ती है 
और हकीकत.... 
फटी कमीज-सी झांकती है !

शर्मीला
शोधार्थी हिंदी विभाग
पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़


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