बेवकूफ

      सारी रात प्रयोगशाला में दिमाग खपाने के बाद सुबह की ताज़ा हवा अपने फेफड़े में उड़ेलने की गरज से वह खुले मैदान में आया | टहलते टहलते सहसा उसकी निगाह एक गधे पर पड़ी जो उसे बार- बार तिरछी नज़र से देखकर मुस्करा रहा था | गधे की इस विचित्र हरकत पर उसे विस्मय हुआ | उसकी इस हरकत की वज़ह जानने की उत्सुकता बढ़ी और वह गधे के क़रीब जा खड़ा हुआ, “क्यों श्रीमान मूर्खाधिराज, आज तुम्हारी होठों पर ऐसी मुस्कराहट क्यों ?”

उसकी बात सुनकर गधे ने अपनी मुस्कराहट हँसी में बदल दी | ढेंचू-ढेंचू के मध्य उससे कहा, “तुम वैज्ञानिक हो न ?”

“हाँ , हूँ तो !”

“लेकिन इससे पहले एक इंसान हो !”

“बिल्कुल ठीक !”

“तुमलोग मुझे बेवकूफ समझते हो न !”

“गधा का मतलब तो बेवकूफ ही होता है !”

“यही तो तुमलोगों की सबसे बड़ी बेवकूफी है !”

इंसान के लिए बेवकूफ का संबोधन ! वह भी गधे के मुख से ! तत्काल खींझकर उसने दहाड़ा, “क्या बकता है बे ?....साफ़ –साफ़ कह डाल !”

गधा अपनी हँसी को नियंत्रित किया |गुरु गंभीर स्वर में उससे पूछा , “अच्छा बताओ , आदमी जिस डाल पर बैठा हो , उसे ही काटने लगे तो उसे क्या कहोगे ?”

“वैरी सिंपल , बेवकूफ !”

“हूँ !.”...गधे ने दार्शनिक अंदाज़ में गर्दन हिलायी |

“यह बताओ , दुनिया भर के हथियार , मिसाइलें और बम वगैरह कौन बना रहा है ?”


“वैज्ञानिक !...मेरा मतलब है इंसान !”

“इन सब हथियारों का इस्तेमाल कौन करेगा ?”

“आदमी !”

“इन सब हथियारों से कौन मरेगा ?”

“आदमी !”

गधे की मुस्कराहट तीव्र हो गई | निष्कर्ष पर पहुँचने के पूर्व ही वैज्ञानिक को एकदम से अपनी गलती का एहसास हो गया | खिसियाकर उसने गधे को एक धौल जमाई |

वैज्ञानिक की ऐसी दशा देखकर गधा जोर –जोर से रेंकने लगा |

मार्टिन जॉन
अपर बेनियासोल, पो.आद्रा, जि. पुरुलिया,
पश्चिम बंगाल 723121, मो.09800940477

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