जीवन से अभिसार हो गया

जीवन से अभिसार हो गया।
मौसम से फिर प्यार हो गया।
ओ मृगनयनी दृष्टि बाँचना, 
शलभ-शलभ उजियार हो गया।
क्या जाने कब आई सन्ध्या,
किसका कब अधिकार हो गया।
गन्धक भी जो भा गर ही थी,
उपवन का संसार हो गया।
संयम की सीमा रेखा में,
पर्णकुटी विहार हो गया।
तुमको छूकर सब कुछ पाया,
लघुता का जल क्षार हो गया।

दर्पण सा टूटा ‘अतृप्त’ फिर, 
जुड़ने का अधिकार हो गया।   

राजेंद्र मिश्र ‘अतृप्त’ मीरजापुरी

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