रामा - महादेवी वर्मा

     हिन्दी साहित्य क्षेत्र में महादेवी वर्मा मूलतः कवयित्री के रूप में प्रतिष्ठित हैं। कवयित्री के रूप में प्रख्यात होने पर भी इनके कालदर्शी कवि हृदय ने समय-समय पर यह अनुभव किया कि छन्दों के बंधे-बंधाये माध्यम से बहुत कुछ प्रकट कर देने पर भी कुछ अनकहा रह गया है। इस कुछ अनकहे को महादेवी ने गद्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। अपने गद्य लेखों में कविता की भाँति आकाश में विचरण न कर महादेवी जी इस धरा पर ही अवस्थित है। कविता के सुरम्य मनोहारी वातावरण के मोह को संवरित कर समाज केन्द्रित हो इसके लिए उन्होंने उसकी विषमता के प्रति आक्रोश व्यक्त किया है। गद्य लेखन में महादेवी जी ने आत्मःदुख को अविशेष मानकर उपेक्षित एवं असहाय अज्ञात, धूमिल तथा घृणित जीवन को वाणी दी है। ऐसा करने में उन्हें कविता लेखन की तुलना में कम परितोष लाभ नहीं हुआ। आत्मतोष लाभ की इस प्रक्रिया में जिन गद्य लेखों की रचना हुई उनमें ‘अतीत के चलचित्र’ का अपना पृथक महत्व है। 

     अतीत के चलचित्र का पहला चित्र ग्रामीण भृत्य कुरूप रामा के जीवन से सम्बद्ध है। रामा का जीवन वृतान्त महादेवी जी के बाल्य-जीवन की अनेकशः झलकियाँ प्रस्तुत करता है। रामा के जीवन का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करती हुई महादेवी जी ने अपने शब्दों में व्यक्त किया है “वास्तव में जीवन सौन्दर्य की आत्मा है,पर वह सामंजस्य की रेखाओं में जितनी मूत्तिमत्ता पाता है,उतनी विषमता में नहीं। जैसे-जैसे हम बाह्य रूपों की विविधता में उलझते जाते हैं,वैसे-वैसे उनके मूलगत जीवन को भूलते जाते हैं। बालक स्थूल विविधता से विशेष परिचित नहीं होता,इसी से वह केवल जीवन को पहचानता है। जहाँ से जीवन से स्नेह-सद्भाव की किरणें फूटती जान पड़ती हैं,वहाँ वह व्यक्त विषम रेखाओं की उपेक्षा कर डालता है और जहाँ द्वेष, घृणा आदि के धूम से जीवन ढँका रहता है वहाँ वह बाह्य सामंजस्य को भी ग्रहण नहीं करता”1

     अतीत के चलचित्र में महादवेी वर्मा ने समय-समय पर अपने सम्पर्क में आये उन व्यक्तियों के संस्मरण लिखे हैं,जिन्हें समाज उपेक्षित मानता है। रामा अतीत के चलचित्र का एक ऐसा ही पात्र है। विमाता के अत्याचार से भाग खड़े हुए बुन्देलखण्डी अनाथ बालक रामा के अपरूप का सेवाव्रत में दीक्षित होने का और माँ की संवेदना द्वारा उसे घर के छोटे विद्रोही बच्चों को वश में करने के गुरुत्तर कर्त्तव्य सौंपे जाने का बड़ा सजीव चित्र अंकित किया हैं रामा के सम्बन्ध में विस्तृत परिचयात्मक विवरण प्रस्तुत करते हुए महादेवी जी लिखती हैं – “मेरा बचपन समकालीन बालिकाओं से कुछ भिन्न रहा,इसी से रामा का उसमें विशेष महत्व है। मेरे पंडित जी से रामा का कोई विरोध न था,पर जब खिलौनों के बीच में ही मौलवी साहब,संगीत शिक्षक और ड्राइंग मास्टर का आविर्भाव हुआ तब रामा का हृदय क्षोभ से भर उठा। कदाचित वह जानता था कि इतनी योग्यता का भार मुझसे न संभल सकेगा। मौलवी साहब से तो मैं इतना डरने लगी थी कि एक दिन पढ़ने से बचने के लिए बड़े झाबे छिपकर बैठना पड़ा अन्त में रामा और माँ के प्रयत्न ने ... उर्दू पढ़ने से छुट्टी दिला दी।”2

     “रामा के बिना भी संसार का काम चल सकता है यह हम नहीं मान सकते थे। बिमारी के सम्बन्ध में रामा से बढ़कर सेवा परायण और सावधान व्यक्ति मिलना कठिन था। ऐसे अवसरों पर रामा का स्नेह हमें इस प्रकार घेर लेता था कि और किसी अभाव की अनुभूति असम्भव हो जाती थी।... आज मैं इतनी बड़ी हो गई हूं कि राजा भइया कहलाने का हठ स्वप्न सा लगता है। बचपन की कथा कहानियाँ कल्पना जैसी जान पड़ती है और खिलौने के संसार का सौन्दर्य भ्रान्ति हो गया हैं पर रामा आज भी सत्य है सुन्दर है स्मरणीय है। मेरे अतीत में खड़े रामा की विशाल छाया वर्तमान के साथ बड़ती जाती है - निर्वाक निस्तन्द्र पर स्नेह तरल।”

     प्रस्तुत संस्मरण रामा कहानी के निकट होते हुए भी है संस्मरण ही। कहानी जैसा उतार-चढ़ाव रामा में खोजना व्यर्थ होगा। क्योंकि उसकी रचना में कहानी का तात्विक आधार नहीं ग्रण किया गया है। तो एक वास्तविक व्यक्ति का आंखों देखा चित्र है। महादेवी जी ने स्वयं रामा के जीवन वृत को देखा गया है। उसके सम्बन्ध में उनका अनुभव व्यक्तिगत था। इसीलिए उसे संस्मरण ही कहना चाहिए। इस संस्मरण महादेवी जी के भावुक व्यक्तित्व की स्वीकारोक्ति मिलती है। उन्होंने इसमें करुणा की जिस गहराई को प्रदर्शित किया है ममत्व और अपनत्व के जिस घेरे में जीर्ण मानवता को समेत लिया है,उससे स्पष्ट होता है कि उनमें कवि हृदय प्रधान है। उनकी संवेदना का प्रसार समस्त मानव समाज में है। जहाँ कहीं भी जीर्ण-शीर्ण मनुष्यता के दर्शन होते हैं – “महादेवी जी की उत्सुक आँखें उसके बाह्य के पीछे छिपी पूरी अन्तर कथा को पढ़ लेने की चेष्टा करती है। इसी से शैशव की विभिन्न स्मृतियों से पूर्ण रामा के चित्रण में उनकी कोमल कल्पना का वितान तना है।”3

     रामा में रामा के चरित्र का उद्घाटन अपनी समग्रता में हुआ है। रामा का नाटकीय ढंग से आगमन भृत्य के रूप में उसकी नियुक्ति,उसकी कर्त्तव्य निष्ठा एवम् और अन्त में उसकी विदा की कारुणिक घटना वत्सलता उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को हमारे समक्ष खड़ा कर देती है एक उदाहरण दृष्टव्य है – “रामा के संकीर्ण माथे पर खूब घनी भौहें और छोटी छोटी स्नेह तरल आँखें कभी-कभी स्मृति पटल पर स्पष्ट अंकित हो जाती है और कभी धुंधली होते होते एकदम खो जाती है। किसी थके झुंझलाये शिल्पी की अन्तिम भूल जैसी अनगढ़ मोटी नाक,साँस के प्रवाह से भर कर फूले हुये से नथुने,मुक्त हँसी से भर कर फूले हुए से होंठ तथा काले पत्थर की प्याली में दही की याद दिलाने वाली सघन और सफेद दन्तपंक्ति के सम्बन्ध में भी यही सत्य है।”

     चित्रण की विशेषता भी रामा में है। महादेवी जी क्योंकि स्वयं एक सफल चित्रकार हैं इसीलिए चित्रण में उन्हें बड़ी सफलता मिली है। रामा का एक और चित्र द्रष्टव्य है - साँप के पेट जैसी सफेद हथेली और पेड़ की टेढ़ी मेढ़ी गाठदार टहनियों जैसी उंगलियों वाले हाथ की रेखा हमारी जानी बूझी थी क्योंकि मुँह धोने से लेकर सोने के समय तक हमारा उनसे जो विग्रह चलता रहता था। उसकी अस्थायी सन्धि केवल कहानी सुनते समय होती थी। दस भिन्न दशायें खोजती हुई उंगलियों के बिखरे कुटुम्ब को बड़े बूढ़े के समान संभाले हुए काले स्थूल पैरों की आहट तक हम जान गये थे।

     महादेवी जी ने रामा के व्यक्तित्व को मूर्तीमान करने के लिए जो शिल्प अपनाया है वह सामान्यतया स्थूल प्रतीत होता हुआ भी अत्यन्त सूक्ष्म एवं सौन्दर्य चेतना को उद्वेलित करने वाला है। जहाँ तक भाषा शैली का प्रश्न है,प्रस्तुत संस्मरण की भाषा संस्कृत निष्ठ है किन्तु उसमें देशज ग्रामीण शब्द भी प्रयुक्त हुये हैं। काव्यात्मक भाषा में व्यंजना प्रधान शैली का सहारा महादेवी जी ने लिया है। एक उदाहरण - वास्तव में जीवन सौन्दर्य की आत्मा है पर वह सामंजस्य की रेखाओं में जितनी मूर्तीमत्ता पाता है उतनी विषमता में नहीं। जैसे-जैसे हम बाह्य रूपों को विविधता में उलझते जाते हैं वैसे-वैसे उनके मूलगत जीवन को भूलते जाते हैं - जहाँ उसे जीवन से स्नेह सद्भाव की किरणें फूटती जान पड़ती हैं,जहाँ वह व्यक्त विषम रेखाओं की उपेक्षा कर डालता है और जहाँ द्वेष,घृणा आदिा के धूम से जीवन ढका रहता है वहाँ वह बाह्य सामंजस्य को भी ग्रहण नहीं करता।

     समाहार रूप में महादेवी जी गद्यक्षेत्र में भी उतनी ही सफल रही हैं। जितनी की काव्य क्षेत्र में अपने स्मृति पात्रों को अपनी रचनाओं में स्थित कर उन्होंने करुण रस की मार्मिकता से पाठकों के अन्तर को आप्लावित किया है। अनुभूति की गहराई के कारण अभिव्यक्ति में कहीं-कहीं दार्शनिकता का पुट भी आ गया है। किन्तु शुष्कता और बोधिकता उसमें नहीं है। उपयुक्त शब्द चयन वाक्य,विन्यास मधुर तथा सार्थक भाषा आकर्षक एवं प्रभावोत्पादक शैली की दृष्टि से प्रस्तुत संस्मरण रामा विशिष्ट रचना है।4

संदर्भ -

1- महादेवी,स्मारिका,पृ. 97
2- अतीत के चलचित्र,महादेवी वर्मा,भारती भण्डार,इलाहाबाद
3- स्मारिका,महादेवी वर्मा,प्रकाशन केन्द्र,लखनऊ,प्रथम संस्करण,सन् 1971 ई.
4- हिन्दी का विवेचनात्मक गद्य,महादेवी वर्मा,भारती भंडार,प्रयाग
5- भारतीय संस्कृति और नारी,महादेवी वर्मा

डॉ. ऋतुवार्ष्णेय गुप्ता
असिस्टेंट प्रोफेसर हिन्दी (एड हाक)
किरोड़ी मल कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय

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