सिर्फ इतना ही

सिर्फ इतना ही

बदला है समय 
अब 'बात' होना
गुणवत्ता की निशानी नहीं 
निकृष्ट और सर्वोत्तम के बीच   
महज उम्दा प्रचार- प्रसार का
नाजुक फ़ासिला है 
पाले हुए भ्रम का
अनायास जीवित हो जाना
और जीवंतता की मृत्यु
अत्यन्त सहज है इन दिनों 

कहीं बड़ा-छोटा, ऊंच-नीच,
पद-पैसा देख हो रहा तय
बुद्धिमत्ता का स्तर
तो कहीं स्वार्थी गुटों में
पूर्व-निर्धारित हैं विजेता
इधर कलई खोलने वाला मूरख
असाध्य रोगी-सा खीजता, तिलमिलाता 
और सरकारी फाइलों में कसमसाते
किसी गम्भीर मुद्दे की तरह
सिसककर बीच राह ही दम तोड़ देता है

हम किसी के लिए पूजनीय हैं
और किसी के लिए कीड़े-मकोड़े
अब तय हमें करना है....
सिर्फ इतना ही.... 
कि स्वयं को दर्पण में देख
बग़ैर शर्मिंदगी के 
मुस्कुरा पाते हैं भी या नहीं!

प्रीति 'अज्ञात'
संस्थापक एवं संपादक - 'हस्ताक्षर' मासिक वेब पत्रिका, सामाजिक कार्यकर्ता

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