ग़ज़ल- शहजहाँ हम हो भी जाएँ तो भला क्या कीजिये

शहजहाँ हम हो भी जाएँ तो  भला  क्या कीजिये |
हो गई मुमताज ही  जब  बेवफ़ा क्या  कीजिये ||

तय हुआ था भूल  जाएँ  मयकदे  का   रास्ता  |
शबनमी हैं लब है  आँखों में नशा  क्या कीजिये ||

लाख कौशिश करके  देखी  भूल  जाऊं मैं  तुम्हें |
भूल पाया ही नहीं अब तू  बता  क्या  कीजिये ||

तोड़ कर सारी  हदें  हम  पार जा कर  आ गए |
हो गईं सारी खताएं  अब  खता  क्या  कीजिये ||

फैसला हक में हुआ गर पर हुआ  तो  क्या हुआ |
काट कर तुम आ गए हो जब सज़ा क्या कीजिये ||

तालियाँ बजती हैं दोनों हाथ  से  ‘आलोक’  जी  |
जब सनम ही बेवफ़ा हो तो वफ़ा क्या  कीजिये ||

अनंत आलोक
साहित्यलोक, ददाहू जिला सिरमौर, हिमाचल प्रदेश

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