काला धन

हाँ, मैं कालाधन हूँ
मुझमें से काला निकाल दो,
तो मैं केवल ‘धन’ हूँ,
फिर भी लोग मेरा मजाक उड़ाते हैं,
काला, काला, काला कह के,
उसमें मेरा क्या दोश है,

मुझे तो काला कुछ धन लोलप्सु,
लोगों ने बनाया है,

मैं तो ‘धन’ के रूप में,
‘लक्ष्मी’ का रूप हूँ,

लोगों के घरों में,
लोगों के दिलों में,
कभी-कभी दिमाग में छा जाता हूँ,

फिर क्या मैं लोगों की बुद्धि भ्रष्ट,
कर देता हूँ,
या यूँ कह लो,
धरती के बुद्धजीवी को अपने मुठ्ठी में,
भर लेता हूँ,

फिर अट्टाहस मारता हूँ,
हा हा हा,

देखो मैं शक्तिशाली हूँ,
मानव नहीं ...............
जिसके पास जाता हूँ,
वो धनाढ्य कहलाता है,
जिसके पास से आता हूँ,
वो कंगाल कहलाता है,

समाज, बाजार, दुनिया सब,
मुझ से चलता है,
मैं नहीं तो जग अंधेरा है,
दिन के उजाले में,

मैं (कालाधन) सामाजिक
मान,
सम्माना,
प्रतिष्ठा,
रूतबा हूँ,

चलती है, मेरी हर जगह,
जहाँ में जाता हूँऔर मुझे धारण करने वाला,
हस्ती बन जाता है...................

इसलिए मैं केवल ‘धन’ हूँ,
जैसा लोगों के रक्त में,
फर्क करना मुश्किल है,
वैसे मुझ में करना,

किसी भूखे, नंगे, फकीर से पूछो,
तो बतलाएगा पैसे का मोल,
मेरा (कालाधन) का प्रयोग
दान
पुण्य
सेवा
भलाई में कर
मुझे काला से सफेद बनाया जा
सकता है,

जो मुझे कालाधन कह मेरा 
निरादर,
अपमान,
और तिरस्कार करते है,

इसलि मैं केवल ‘धन’ हूँ,
कालाधन नहीं!

कुमारी अर्चना
शोधार्थी, राजनीतिशास्त्र विभाग
भागलपुर विश्वविद्यालय, बिहार

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