हे मानव!


किससे करे चालाकी रे मन
सब तो नजर में उसके है,
तू सोचे तेरे पैसों पर मोहित,
फिर तो बिलकुल भोला है।
बोया बाजरा न उगेगा गेहूँ,
ये भी काहे भूल रहा।
कर्म किया वो ही भोगेगा,
चढ़ा चढ़ावा कितना भी।
चाह रहा भगवान खरीदना,
इतना दर्प है दौलत पर।
दौलत उसका दिया हुआ है,
फिर तेरा कैसे  है भोले।
सब धरती पर ही रह जाना,
जाना एक न धेला रे।
फिर काहे का लगा झमेला,
काहे पर तू इतना इतराये है।
बिना बात हत्या कर देता,
चोरी डाका की न पूछो रे।
भाई भाई को भी न छोड़े,
सबसे प्यारी दौलत है।
बेटा बाप पर दागे गोली,
बाप से प्यारा पैसा है।
अन्तिम बेला आई तब साथी,
गया न एक भी रत्ती रे।
साथ जायेगा कर्म ही तेरा,
बस उसका कर ले सुधार तू।
बोयेगा बस वोही पायेगा,
काम न आयेगा चढ़ावा रे।
रे मन अब भी अवसर है तुझपे,
कर कुछ सच्चा काम तू।
देवी पूजन करता है तू मानव,
जिन्दा देवी का तो कर मान रे।
मन्दिर घूम के आया है तो,
घर भी मन्दिर मान ले।
बेटी,बहन, माँ और पत्नी का,
कर पहले सम्मान तू।
घर जैसी ही  बाहर की नारी,
सबका कर पूरा मान रे।
माने तुझको दौलत वाला तब,
भूखे बेघर को एक ठिकाना दे।
सच्चा दौलत वाला तुझको माने,
सब नारी का हो सम्मान रे।
उन बच्चों को उनका बचपन दे,
जो मजदूरी को हैं मजबूर रे।
किससे करे चालाकी रे मन,
सब तो नजर में उसके है।

 डॉ. सरला सिंह
टी.जी.टी.(हिन्दी)
स्थान- दिल्ली

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