न जाने क्यों मुझे अब फर्क़-सा पड़ता नहीं जाँना !

न जाने क्यों मुझे अब फर्क़-सा पड़ता नहीं जाँना !
तुम्हारी याद तो आती है लेकिन
कसक, वो जो कि पहले थी
बहुत कम हो गई है अब...
तवे पर आँच में तपती हुई इक बूँद देखी है ? 
छनकती है जो रह-रह कर
तड़पती है, उछलती है, सिसकती है
मगर जो आँच बढ़ती ही चली जाये मुसलसल तो
यही होता है ना अंजाम आखिरकार जानानाँ !
छनकती बूँद, जल-भुन के हवा में डूब जाती है
अगर रहता है कुछ बाकी तो केवल एक धब्बा-सा
तवे पर, और जिसको अब तपिश बिलकुल नहीं लगती 
"कि जब तक जान होती है, तभी तक आँच लगती है"
सुनो ! वो बूँद मैं था....
सुनो ! वो बूँद मैं था....
न जाने क्यों मुझे अब फर्क़-सा पड़ता नहीं जाँना !

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

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