ग़ज़ल- शहर से हो के रुख़सत जा रही है

शहर से हो के रुख़सत जा रही है
हुई बदहाल, गैरत जा रही है।

बड़ी बेकार आदत थी कि तुम थे
तुम्हारे बाद, आदत जा रही है।

हुये ऐसे तज़ुरबे ही, कि अब तो
रहे-दुनिया से निस्बत जा रही है।

तअल्लुक, नातवाँ क्यों हो रहे हैं 
हुआ क्या है मुरौव्वत जा रही है ?

नसों को हुक्म देकर दिल ये बोला 
लहू टपका, मुहब्बत जा रही है।

फरेबों का शहर तो , नोच खाता
हुआ अच्छा कि शिद्दत जा रही है।

हवस की लार सड़कों पे बिछी है
अकेली, हाय..औरत जा रही है।

किसी के साथ अब कोई नहीं है
कि आँखों की तरावट जा रही है।

बिछी खटिया हुई है रात साहिब
शरीफ़ों से, शराफ़त जा रही है।

जुगाड़ी हो गई जब से व्यवस्था
इबादत और मेहनत जा रही है।

बुझा दें 'दीप' को अहसान कर दें
मिरे सरकार ! हिम्मत जा रही है।

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

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