सावन


"शाम को ही लौटूँगा, खाना मत बनाना दोपहर का मेरा।"

    कहते हुए सुदर्शन ने छाता उठाया और निकल गया। बाहर सावन पूरे जोरोंपर था। मनोरमा ने चुपचाप एक नजर उसकी ओर डाली फिर चेहरा घुमा लिया। कितना बदल चुका था उसका पति। जबतक ससुर जी जीवित थे, सबकुछ ठीक चल रहा था। वे सारी खेती-बाड़ी अपने कंधेपर उठाये घर से बाहर तक के सारे काम हँसते हुए ऐसे कर जाते थे मानों कुछ मेहनत ही नहीं लग रही हो। अपने एकलौते बेटे से इतना मोह कि कभी कोई अपेक्षा नहीं की उससे। चालीस का होने को था, एक बारह साल की बेटी का बाप और किसी का पति लेकिन आदत वही सोलहवाली। लापरवाह, आवारा, सारा दिन इधर से उधर मटरगश्ती। वह अक्सर समझाने की कोशिश करती कि बाबूजी का हाथ बँटाओ, थोड़ा सहयोग दो घर में पर सुनता कौन था? हरबार का एक रटा-रटाया जवाब, अरे मेरी लाजो, तू क्यों चिन्ता करती रहती है? बाबूजी सब बहुत अच्छे से देख ही तो लेते हैं, मेरी क्या जरूरत? वे जिसदिन कुछ कहेंगे तो क्या मैं नहीं करूँगा? अंततः दो साल पहले बाबूजी परिवार की जिम्मेदारियों का कलश उठाये-उठाये ही सो गये। बस तभी से जैसे ग्रहण लग गया घर को। धीरे-धीरे करके सारा पाँच बीघा खेत सुदर्शन ने औने-पौने दामों में बेच डाला। घर के एक हिस्से को किरायेपर लगाकर जैसे-तैसे खर्च चल रहा। तनाव का नाम लगाके अब तो कभी-कभी पीने भी लगा। बीवी की नहीं तो कम से कम अपनी माँ की ही सुने, लेकिन नसीब में दुख हों तो बुद्धि भी बौरा जाती है। इन्हीं ख्यालों में डूबी मनोरमा के चेहरेपर अचानक हवा के तेज झोंके ने खुले आँगन से बरसती बूँदों को ला पटका। उसका ध्यान रिमझिम बरसात की ओर चला गया। उसकी पायल के घुँघरू भी तो ऐसे ही बजते थे न! छन-छन, रुन-झुन! बहुत बुरा है सुदर्शन, पिछले महीने उनको भी छीन के ले गया बेचने के लिए। किसी दिन मुझे भी ऐसे ही....." सोचते-सोचते उसकी आँखें भी सावन जैसी होने लगीं कि तभी सास राधा ने बुलाया।
"बहू, सुनना जरा।"
जल्दी से बहते आँसू पोंछे और सास के कमरे की ओर दौड़ी। आखिर अब वह ही तो थी जिससे अपना दुख बाँट लेती थी।

"हाँ अम्मा बोलो" मुस्कुराहट ओढ़ने की कोशिश करते हुए बोली।

"ले, जरा पैसे बचा रही थी कुछ दिनों से, सुनीता की स्कूल फीस के लिए, पाँच सौ हैं।"

    बिना कुछ बोले मनोरमा ने ले लिया। जानती थी कि कहाँ से बचाए होंगे। अपनी दवा लाने के नामपर किरायेदार से माँगा होगा और यहाँ दे दिया। भरे मन से उठकर चौके में चली गयी। सुनीता सुबह ही माँग रही थी फीस जमा कराने के लिए। दोपहर को लौटेगी तो दे दूँगी, सोचते हुए उसने बर्तन साफ करने शुरू किये। तभी दरवाजेपर किसी ने कुंडी बजाई। दरवाजा खोला तो पटवारी सुंदरलाल खड़ा था। हुँह, अब क्यों आया है? सुदर्शन को ऊल्टा-सीधा सिखा-पढ़ाके सारे खेत बिकवा दिये, अब क्या खून पियेगा? मनोरमा का मन उसको देखते ही जल उठा।


"अरे बहू, सुदर्शन कहाँ है?" सुंदरलाल ने अपनी खिचड़ी दाढ़ी-मूँछोंपर हाथ फेरते हुए पूछा।


"वे बाहर कहीं गये हैं, देर से लौटेंगे" मनोरमा ने अनमनाहट से कहा। वह चाहती थी कि सुंदरलाल जल्द से जल्द चला जाए।


"अच्छा ठीक है, कह देना कि एक बढ़िया पार्टी मिली है। पिछले दिनों उनको ये घर बाहर से दिखाया था तो वे बहुत खुश हुए। बोल रहे हैं कि मालिक से बात कराओ, बाकी उनसे ही समझ लेंगे।"

    क्या? अब ये घर भी बिक जाएगा? बहु बनकर वह जिस घर में उतरी, जिसके एक-एक कोने को उसने अपने बच्चे की तरह सँवार के रखा वह घर किसी और का हो जाएगा? मनोरमा का दिमाग ही मानों शून्य सा हो गया और कानों में तेज सनसनाहट होने लगी। वह चीख पड़ी।

"कुछ नहीं बिकेगा अब मेरा, जाओ यहाँ से।"

    सुंदरलाल के अवाक चेहरेपर ही उसने भड़ाम से दरवाजा बंद किया और रोती हुई अंदर दौड़ पड़ी। कमरे में जाकर बिस्तर पर गिरते-गिरते उसका रोना बहुत तेज हो गया। राधा घबरा के भागी-भागी आयी।

"अरे क्या हुआ री? कौन था?

    लेकिन मनोरमा को होश कहाँ? वह एक सुर से रोये जा रही थी। राधा हैरान-परेशान उसको चुप कराने के असफल प्रयासों में लगी रही। तबतक सुनीता ने दरवाजेपर आवाज दी। राधा ने दरवाजा खोला।

"अरे समझा अपनी माँ को, देख जाने क्यों तब से रोये जा रही।"

"माँ क्या हुआ?" सुनीता भी अपनी माँ को इस हाल में देखकर रुँआसी हो गयी।

    लेकिन मनोरमा ने कुछ नहीं कहा। उसका रोना अब सिसकियों में बदल चुका था। वह उठी और खाना बनाने लगी। सबको खिलाने के बाद उसी तरह खामोशी ओढ़े वह अपने कमरे में वापस आकर बैठ गयी। उसका मन बहुत भारी था। सास और बेटी के लाख कहने पर भी उसने कुछ नहीं खाया और वहीं बैठ दीवार को ताकती रही। सुदर्शन का क्या? वह तो आदतन ही सबकी बातों में आ जानेवाला है। अपनी कोई अक्ल नहीं। पटवारी एकबार फिर कुछ-कुछ बोल के भरमाएगा और वह हमेशा की तरह उसके जाल में फँस जाएगा। यही सोच-सोचकर उसको बार-बार रोना आ रहा था। दुखते सिर ने कब नींद से पनाह माँग ली, कुछ पता ही नहीं चला। सपने में वह एक सुंदर बाग में खड़ी थी। चारों ओर रंग-बिरंगे फूल, तितलियाँ, ठंढी हवा के झोंके, तभी कहीं से उसे अपने उन्हीं घुँघरूवाले पायलों की छनकार सुनाई दी। उसने चारों ओर देखा, कहीं कुछ नहीं था। तभी वही छनकार और तेज उसके कानों में पड़ी और उसकी नींद खुल गयी। सामने सुदर्शन हाथों में उसके वही पायल लिए खड़ा था। वह चौंक गयी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। ये भी सपना है या हकीकत? उसने पलटकर देखा। राधा और सुनीता भी वहीं पास खड़ी मुस्कुरा रहीं थीं। वह झटके से उठकर बैठ गयी और सुदर्शन के हाथों से लपक के अपने पायल ले लिए और उनको निहारने लगी।

"ये कहाँ से लाए?" हैरत से पूछा।

    सुदर्शन का मुस्कुराता चेहरा अब संजीदा हो उठा।

"तुमलोगों का ख्याल नहीं रख रहा था न सो बाबूजी रोज मेरे अंदर से मुझको डाँटने लगे थे अब। पिछले महीने तो हद कर दी उन्होंने। कह दिया कि तेरे अंदर से भी चला जाऊँगा अगर तू नहीं सुधरा तो लेकिन मैं करता भी तो क्या? खींच-खाँच के बारहवीं तक पढ़ा हूँ और उम्र भी गुजर चुकी नौकरी पाने की। एक बीमा कंपनी का विज्ञापन देखा एकदिन अखबार में। पिछले महीने तुम्हारे पायल ले गया था न माँगकर? क्योंकि पास में बिल्कुल भी पैसे नहीं थे। सुनार के यहाँ जाकर भी जब उनको बेचने की हिम्मत नहीं जुटी तो बस गिरवीभर रखकर उससे मिले रुपयों से उस बीमा कंपनी के एजेंट के लिए आवेदन किया। बाकी थोड़े पैसे उसी की ट्रेनिंग और परीक्षा आदि में लग गये। घर में किसी को कुछ बताया नहीं क्योंकि अपनेआप से ही भरोसा उठ सा गया था। जाने सफलता मिलती या नहीं। अभी पिछले हफ्ते एजेंसी से लाइसेंस मिला। सारा दिन आवारागर्दी करता हूँ न! बहुत से लोगों से इसी आदत के कारण परिचय है। उन्हीं में से एक ने अपना बीमा मेरे माध्यम से कराया। थोड़े खाते-पीत आदमी हैं, पूरे पच्चीस लाख का कराया उन्होंने। मेरा कमीशन बीमा कंपनी ने नब्बे हजार रुपये तय किया जिसका चेक बहुत जल्द मिल जाएगा और कल दस हजार रुपये कंपनी के एक अफसर ने मुझे पहलीबार में ही इतना बड़ा बीमा कराने के कारण इनाम में दिए अपनी ओर से। उनसे आज तुम्हारे ये पायल छुड़ाकर ले आया। कुछ और लोगों से भी बात हुई है। पूरी उम्मीद है कि अगले हफ्तेतक वे भी मुझसे बीमा ले लेंगे। आज के बाद तुममें से किसी को कोई कमी नहीं होने दूँगा।"

    सुदर्शन एक साँस में सब बोल गया और मनोरमा आश्चर्यमिश्रित मुस्कुराहट के साथ सब सुनती रही। उसको अपने कानोंपर विश्वास नहीं हो रहा था। सुनीता ताली बजाती हुई अपने पापा से लिपट गयी।

"मेरे पापा सबसे अच्छे हैं।"

सुदर्शन ने भी उसे गले से लगा लिया।

"नहीं बेटा, तुम्हारी माँ और दादी सबसे अच्छी हैं, तुम जिन्दगी में उनके जैसी ही बनना।"

सावन अब सबकी आँखों में था।

कुमार गौरव अजीतेन्दु
पता - c/o श्री नवेन्दु भूषण कुमार
शाहपुर (ठाकुरबाड़ी मोड़ के पास), दाउदपुर (पोस्ट)
दानापुर (कैंट), पटना - 801503 बिहार

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