नमाज़-ओ-आरती

नमाज़-ओ-आरती...
नमाज़ पढ़ते वक़्त 
न अल्लाह न रसूल 
न मौला ही कहा मैंने 
हाँ, वुजू किया था 
इत्र डाला हुआ था सर से पा 
नमाज़ी तो मैं पाँचो वक़्त का था 
कुरआन हाथ में लिए बैठे 
कर रहे थे याद सब अल्लाह को जिस वक़्त, मैं 
ले रहा था नाम अपने प्राणप्यारे राम का 
"एक मेरा राम बस उसके इतर कोई नहीं...."
फिर चला मस्ज़िद से दौड़ा 
पास के मंदिर तरफ़
हाथ धोये और आया गर्भगृह के सामने 
आरती होने लगी थी, 
गूँजती थी घंटियाँ 'श्री राम की' धुन में रमी
रोम मेरे उठ खड़े थे,
फिर न ही शिव नाम बोला  और ना ही राम ही 
हाथ जोड़े और अपनी प्रीत में खोते कहा 
"ला इलाहा इल्लल्लाह, मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह..."
अब मुझे कुछ भी कहो 
अच्छा, बुरा, बहरूपिया 
जो भी हूँ जैसा भी हूँ
हिन्दू भी हूँ मुस्लिम भी हूँ....

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

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