ग़ज़ल- मुश्किल को आसान समझना छोड़ दिया

मुश्किल को आसान समझना छोड़ दिया!!
दुश्मन को नादान समझना छोड़ दिया!!

वक़्त के आगे कौन ठहरता है यारों,
दौलत को ईमान समझना छोड़ दिया!!

आँख दिखानेवाले मुझको होश में आ,
झोकों को तूफ़ान समझना छोड़ दिया!!

होने लगी है जबसे सियासत लाशों पे,
मुर्दों को बेजान समझना छोड़ दिया!!


खाया जबसे धोखा दस्तर खान पे,
दुश्मन को मेहमान समझना छोड़ दिया!!

बढ़ने लगी है अय्याशी इंसानों में,
शेतां को शैतान समझना छोड़ दिया!!



जाहिद खान 'जाहिद'
पाली-हरदोई, उत्तर प्रदेश

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