पहाड़


पहाड़
कल भी रोता था
आज भी रोता है
लेकिन
सुन नहीं पाता कोई
उसकी सिसकियाँ,
रक्त से
सना सीना देख
रो देता है पहाड़
खामोशी से,
लहू तो लहू है
एक ही रंग है
उसके मेरे लहू का,
पहाड़ सोचता है
दोनों तरफ पड़ती है
धूप एक जैसी ही,
बरसात,
तूफान और झंझावत
सहते हैं
इस और उस तरफ के पहाड़,
पहाड़ देखता है
बच्चों को खेलते तलहटी में
और खुश होता है
बच्चों की खुशी में,
पहाड़ आज
बेहद उदास है
बाँट दिया है लोगों ने उसे,
पहाड़
बँटना नहीं चाहता
और नही
देखना चाहता है
क्षत विक्षत शव,
लहू की नदियाँ,
और धूँए के गुबार।


रौशन जसवाल ‘विक्षिप्त’
सम्पर्क, शान्त कंवल कुंज, ढली शिमला

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