ग़ज़ल-ये सूनी डगर की थकी नम हवायें

ये सूनी डगर  की  थकी नम  हवायें
हक़ीक़त सुनायें तो किसको सुनायें

ये  दुशवारियाँ  तब  फसानें  बनेंगी
जो घायल परिंदे के पर फड़फड़ायें

मुझे बादलों से शिकायत  न  होती
अगर  साथ  वर्षा  के  ही  गड़गड़ायें

मेरी  रूह   छूने     लगी   है   बुलंदी
क़दम  लड़खड़ाते हैँ, तो लड़खड़ायें

न बादल, न आँधी, न पत्थर है दिल ये
भला क्यों इसे बिजलियाँ आज़मायें

न  जाने  हुआ  हाल क्या जिंदगी का
मुझे देख कर रो उठी हैं दुआयें

मेरे हौसलों को ये लहरें ज़हन की
गिरा कर उठायें, उठा कर गिरायें

सितारा कोई टिमटिमा कर बुलाता
मगर कोई कैसे दे उसको सदायें

ये लाली नजाने है कैसे सहर की
न मिलकर चहकती है कम सिन फजायें

तू खिलता रहे तो क़यामत नहोगी
'सुमन' ये हवायें लें तेरी बलायें

लक्ष्मी खन्ना ‘सुमन’

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