ग़ज़ल- जान से तो गए ही गए हम जिन्दगी से भी गए

जान से तो गए ही गए हम जिन्दगी से भी गए |
इश्क  का  इजहार  करके  दोस्ती  से भी गए ||

चोखटे पर  वख्त  ने  यूँ छाप  दी  हैं  जुर्रियाँ |
आशिकी से तो गए थे  दिल्लगी  से  भी  गए ||

पैरहन ही जब किसी के जिस्म से ले मुफलिसी |
आ  गए  लंगोट  में  हम सादगी  से भी गए ||

तार कर उसको जमीं पर मस्जिदों में धर दिया |
साथ मिलता क्या खुदा का बंदगी  से भी गए ||

चाँद को छत पर बुला तो लूं मगर डरता हूँ गर |
रू- ब -रू हम हो गए तो चांदनी से भी गए ||

कर दिया बंजर जमीं को खाद ने ‘आलोक’ यूँ |
क्या फसल होगी यहाँ अब घासनी से भी गए ||

अनंत आलोक
साहित्यलोक, ददाहू जिला सिरमौर, हिमाचल प्रदेश

0 comments:

Post a Comment