संस्कृति की सरहद

     साहित्य को समाज का दर्पण काकहा जाता है; उस समाज का दर्पण जिसकी अपनी एक संस्कृति होती है। प्रत्येक समाज में मनष्यु तथा उसकेआस-पास के जीवित एवं अजीवित कारक पूर्णरूप सेएक-दसरे सेसामजस्य बनाए रखते हैं। मानवजीवन को संचालित करनेवाले मल्यों, नैतिक बलों तथा कर्तव्यों का इस सामंजस्य के निर्वाह में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। इन तत्वों की अभिव्यक्ति ही हमारी 'संस्कृति' का निर्माण करती है। यहअभिव्यक्तिसृजनात्मक, अप्रत्यक्ष, बहुमुखी तथा दीर्घकालीन होतीहै।

    अब प्रश्न उठता है कि इस अप्रत्यक्ष अथवापरोक्ष अभिव्यक्ति अर्थात संस्कृति का शाब्दिक अर्थ क्या है ? विद्वानों केअनुसार'सम' उपसर्गपूर्वक 'कृ' धातुसेभूषण अर्थमें'सटु' के आगम तथा 'क्तिन' प्रत्यय के योग से'संस्कृति' शब्द का निर्माण होता है. विद्वानों की मानेंतो मनष्यु की भूषण युक्त अर्थात सुन्दर सम्यक कृति या चेष्टाएंही संस्कृति हैं । स्मरण रहे कि'संस्कृति' और 'सभ्यता' दो अलग-अलग शब्द हैं।सभ्यता मानवकी'भौतिक' आवश्यकताओं कीपूर्ति करती है,जैसेवर्चस्व, दौलत, साम्राज्य इत्यादिकिंतु'संस्कृति' आत्मा का आधार है, मन को प्रसन्न करने का साधन। यदि पुष्प‘सभ्यता’हैतो'सगुंध' संस्कृति है।
    
    बरसों का अर्जन, विचार-विमर्श, मैत्रीतथा अन्य आदान-प्रदान कब संस्कृति बन जाते हैं और कब हमारे समाजका आधार बनते हैं – हमें पता ही नहीं लग पाता।एक तरफ ये बल परोक्ष बने रहते हैं, लेकिन जब मनष्यु इनको प्रत्यक्ष करना चाहता है तोवह अन्य अभिव्यक्तियों का सहारा लेता है, जैसे साहित्य, चित्रकला, नत्यृ,ललित कला, संगीतइत्यादि। साहित्य और संस्कृति का गहरा सम्बन्ध है,जिसकोयदि कागज़-क़लम के सहारेतहरीर किया जाए, तो यह संबंध'ग्रन्थ' का रूप ले ले।

    मनष्यु की उत्तम कृतियों का उद्गम उसकी संस्कृतिहै,जिसे वह साहित्य के ज़रिए सामने लाताहै। उदाहरण के रूप में भारतीय संस्कृति का आधार एवं परम ध्येय विश्व-शांति रहा है, जिसकीअभिव्यक्तिमहोपनिषद में'उदारचरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम' के रूप में हुई। उर्दू साहित्य के महान रत्नअल्लामा इक़बाल ने इसी बात को ‘अखुव्वत की जहाँगीरी, मोहब्बत की फ़रावानी' कहकरसंबोधित किया और जब-जब विश्वशांति परहमले हुए, इसके प्रतिछल करने के क़दम उठाये गए, तब-तब किसी साहित्यकार ने हीआवाज़ उठाई है। सर्वविदित हैकि ‘लीग ऑफ़ नेशंस' की कपटपूर्वकस्थापना के विरुद्धबोलते हुएजनवरी 1921 में नोबेल साहित्यकार रवीन्द्रनाथ टैगोरे ने कहा था कि ‘मानव जाति इसके लिए कदापि तैयार नहीं।’

    मनुष्य उन्मुक्त है, स्वच्छंद है और यही संस्कृति का मर्म है। मनष्यु को यातना देनेवाले बंधन स्वीकारनहीं। विश्वपटल परपूँजीवादी तथा साम्राज्यवादीशक्तियों के विरुद्धबोलने का बल जनमानस को इसी साहित्य ने दिया। संस्कृति में ‘वंदे मातरम' उर्दू में ‘सरफ़रोशी की तमन्ना' बंगला में ‘एकला चलो रे' जैसे उद्घोषों ने स्वतंत्रता की उन्मुक्तअभिव्यक्तियों को अचूकसामर्थ्य दी। फ्रांस की क्रांति का मक़सद भी तीन ‘शब्दों' में ढला- स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व। इसके अतिरिक्त जब हमारीसामाजिकव्यवस्था की बात आती है, तो इसमें दो तत्वविद्यमानहोते हैंअर्थात संस्कृति के ‘ताने' में हमारेकार्यों,हमारेकर्मों का ‘बाना’बुना जाता है, तब जाकर एक स्थिर समाज बनता है। संस्कृतिपरआधारित समाज की खाक़ाकशी साहित्य से ही होती है। कभी प्रेमचंदअपनी‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’, ‘ईदगाह’से समाज की तह तक जाते हैं, कभी महादेवी वर्मा‘मेरा परिवार’, ‘गिल्लू’, और ‘स्मृति कि रेखाएँ’ में इंसानियत के दायरे को मानवयोनि के बाहर देखती हैं। विलियमवर्ड्सवर्थ इन्द्रधनुष की तश्तरी पर बैठकर जनमानस को प्रकृति की सैर करा रहे हैं। कभी जॉन कीट्स को मनष्यु की प्रेमतृप्ति प्रकट करते हुए देखा जाता है, तो कभी रूमी, रहीम, मीरा, रसखान को परम-प्रियतम की परम-तृष्णा में डूबे हुए देखा जाता है।

    यह सब किस बल के अनुरूप है ? इसका मक़सद क्या है ? येमन की मुद्राएँ क्यों काग़ज़ पर अंकित की जाती हैं ? क्यों येजनमानस को लुभाती हैं ? क्यों फैज़ अहमद फैज़कह बैठते हैं - ‘हम परवरिश-ए-लौहो क़लम करते रहेंगे’ ? क्यों महिलाओं के दमन पर शायर मजाज़ कह उठते हैं – ‘तू इस आँचल सेइक परचम बना लेती तो अच्छा था’? पता चलता है कि ये सब मनष्यु केमन में उपज रही‘उत्तम कृतियों’के कारण है,जिसे हम संस्कृति कहते हैं। उत्तम कृतियाँ यानी उत्तम समाज बनाने की लालसा, जो मनुष्य को हमेशा प्रोत्साहित करती है किहम बनाएँ कुछ बेहतर। यदि साहित्य न हो तो ये अभिलाषाएँ, जिन्हें हम अपनी संस्कृति कहते हैं, दबी की दबी रहजाएँअथवा यूँ कह लीजिएकि संस्कृति है तो साहित्य का भी अस्तित्व है।

    संस्कृति मनुष्य की वह अभिव्यक्ति है, जो साहित्य की भाषा में ही प्रत्यक्ष और साकार हो पाती है और मन को आराम, सुख, प्रसन्नता देती है। ठीक उसी तरह जैसे एक सुंदर नारी दर्पण में स्वयं को देखकर प्रसन्न होती है। ठीक ही कहा है-साहित्य समाज का दर्पण है, उस समाज का दर्पण जिसकीअपनी एक संस्कृतिहोती है।


मुहम्मद नवेद अशरफ़ी

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