मान मर्यादा

हम
सिर्फ...
किसान और मजदूर
नहीं हो सकते
रास्ते में
हमारी भूखी-नंगी जाति
और लंगड़ा मजहब
जाग उठता है
जिसके कंधों पर
सवार होकर
बरसाती मेंढ़क
टर्र...टर्र करके
हमारे बचे-कुचे
चिथड़े भी दबोच लेते हैं
हमारी गर्दन
चार पायो के नीचे
दबी पड़ी है
जिनका खुद का धर्म
बैंक के लॉकर में
गिरवी पड़ा है..
और सारी
मान-मर्यादा
हमारी फटी जेब के
छेद में अटकी है !



शर्मीला
शोधार्थी हिंदी विभाग
पंजाब विश्वविद्यालय,चंडीगढ़

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