मैं और तुम


सुनो! तुम कहाँ हो?
मेरे शब्द में तो नहीं,
क्या????
मेरे भाव में....
नहीं नहीं... भाव मेरे है,
अच्छा...तो अर्थ?
अर्थ मेरे ही है....
अच्छा....झूठे!!!
तुम तो संयम, मर्यादा,
सत्य, स्पष्ट, सरल हो,
फिर रचना विपरीत क्यों?
क्लिस्ट, अस्पष्ट,
और बेतरतीब,
बिखरा हुआ,
क्या???
कवि हो!!!
हा..हा...हा
शब्द...अर्थ... भाव मेरे,
और कवि तुम....?
हाँ...क्या तुम,
उन आसुओं को भूल गई?
जिनसे तुम्हें गढ़ा हूँ,
बंद आँखों से पढ़ा हूँ,
रक्त से सींचा हूँ,
नींद...चैन से
अदावत किया हूँ,
खुद से बगावत किया हूँ,
ये सिर्फ संवेदना नहीं,
दग्ध हृदय की वेदना है,
हर अक्षर उस वेदना का,
प्रतिरूप है,
निश्चय ही तुम निर्मल हो,
पर मेरे निश्छल प्यार,
व्यापार का विषय तो नहीं,
पर जो भी हो,
तुम सच कहती हो,
मैं बस उतना हूँ,
जितना तुम नहीं हो,
या बस तुम ही हो,
मैं कहाँ हूँ!!!

सौरभ सतर्ष

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