बाल दिवस

बाल दिवस हम सब माता पिता के लिए एक बहुत बड़ा संदेश लेकर आता है । आज हम अपने बच्चों को बहुत अधिक दे कर उनकी इच्छाओं का गला घोंट रहे हैं । उनको मीठा उतना ही दिया जाए जिससे वह पंगु न बने । एक अध्यापिका होने के नाते मुझे पता है कि आज बच्चों को उनके बस्ते तक का बोझ उठाने नहीं दिया जाता है । एक मांगने पर हम और आप दो देते हैं। हमें लगता है कि ज्यादा से ज्यादा सुविधाओं में रखकर उन्हें आलसी बनाकर हम अपने बच्चों का भला कर रहे हैं। बच्चा वस्तुओं का महत्व समझे या नहीं पर हम पड़ोसी के बच्चे को देखकर वे सब कुछ लाकर देते हैं जो दाम में अधिक हो । 

    आज हम बाल दिवस मनाते जरूर हैं पर बालपन/ बचपन तो हमने खत्म ही कर दिया है । आज पांच साल का बच्चा मोबाइल चलाता है ,बड़े जैसे हाव भाव व नृत्य आदि करता है और हम बहुत खुश होते हैं । के. जी में पढ़ने वाले बच्चों के माता पिता बड़े गर्व से बताते हैं मेरे बच्चे की गर्ल फ्रेंड है या बॉय फ्रेंड हैं । हम खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। संस्कार व संस्कृति के नाम पर केवल शुन्य / सिफर दे रहे हैं । आज सातवीं कक्षा से ही बच्चे माँ के बस में नहीं रहते और कक्षा नौ में आते ही पिता के नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं । अब सारी जिम्मेदारी आज दीन हीन अध्यापकों की रह जाती है । 
    
    हमारा आपका बच्चा इस मशीनी दुनिया के मशीनी प्यार में पिस कर रह जाता है । हर पल वह अपने आप को अकेला महसूस करता है। डरा हुआ सहमा सा रहता है । क्योंकि उसे बचपन में प्यार मां का नहीं नौकरानी/ आया का मिला । उसने कभी मां की गोदी का आनंद नहीं लिया, माँ का आंचल पकड़कर कभी नहीं धूमा ।सब कुछ मिला पर जो मिलना चाहिए था वो नहीं मिला । उस पर भी सबसे अधिक दोषारोपण इन मासूमों को दिया गया । हम क्यों अपना समय भूल गए, माँ कैसे छाती से लगाये रहती थी । असीम प्यार करती थी पर गल्ती पर दंड भी देती थी । अपने सभी काम हमसे स्वयं करवाती थी, जूते पॉलिश करना, अपनी किताबों का रैक जमाना, अपनी यूनिफार्म धोना यहां तक की अपने खाने के बरतन भी स्वयं धोना । आज वह माँ कहीं खोती जा रही है । वह पिता जो हमारे साथ दौड़ता खेलता भी था और अनुशासन में भी रखता था वह आज बच्चों के प्रात: उठने से पहले निकल जाता है और रात में बच्चों के सोने के बाद आता है । आज बच्चों को पिता के दर्शन तक दुर्लभ होते हैं और उस पर आलम यह है कि आज कल के बच्चे किसी की सुनते ही नहीं हैं बिगड़ते जा रहे हैं।

    आज हमारे पास समय ही नहीं है अपने गिरेवान में झांकने का । हमने सिर्फ दोष देना सीखा है । हमने तो अपने बच्चे को सभी कुछ दिया राजकुमारों जैसा रखा पर पता नहीं कैसे बिगड़ गया । देर आए दुरुस्त आए, समय अभी भी बाकी है बच्चों को नहीं खुद को संभाल लीजिए अन्यथा परिणाम जग जाहिर है, तो आज बाल दिवस पर हम सब यह प्रण ले कि बच्चों का बचपन वापस लाने में पूर्ण सहयोग करेगें । उन्हें सुसंस्कृत व संस्कारी बनाने के लिए हम पहले स्वयं परिवर्तित होगें । पुरानी फसल सुधरते ही नई फसल हरी भरी हो जाएगी।

निशा गुप्ता
तिनसुकिया, असम
राष्ट्रीय सचिव
नारायणी साहित्य अकादमी

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