साहित्य

दिखाता है सही चेहरा 
मीडिया 
तो बिक चुका है 
अर्थ का साम्राज्य है 
भ्रष्टाचार का मानसून आया 
आदर्श 
केवल गड़गडा रहे हैं 
अन्याय की वृष्टि हुई 
चहुँ ओर कीचड़ हो गया है 
लीपा-पोती चल रही है 
दशहरे की 
ध्वस्त होगा इस बार 
अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार 
का रावण 
या अट्टहास करेगा ? 
मानवता के ऊपर हावी 
दावनता पर ।
छोटे-छोटे व नवोदित 
जो सताए हुए हैं 
अन्याय-अत्याचार से 
साहित्य का शीशा लिए 
निहार रहे हैं छवियाँ । 
साहित्य तो दर्पण है 
सच्चाई बयां करेगा । 
जो विज्ञापन की इस आँधी में 
उड़ रहा है 
व्हाट्स ऐप व फेशबुक पर 
ट्विटर मनु की नाव बनकर 
ठेकेदारों को ढो रही है । 
ये नाव क्या लेगी बचा ? 
जब आएगा झोंका बड़ा 
साहित्य का ? 
होंगे सभी जलमग्न इसमें । 
जो सँवारेगा चरित्र 
और दायित्वों का सुचित्र 
न झुकेगा 
न रुकेगा 
अन्याय की इस बरसात में 
वही केवल बचेगा । 
इतिहास वह ही रचेगा ।।

राज वीर सिंह 
तरौंदा कानपुर देहात 

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