महानायक की तालाश में : अमीश का ‘मेलूहा’

       सदियों की दास्तां की ओर नज़र डालें तो युद्ध और शांति से लेकर क्रांति, राष्ट्रवादी आंदोलन हो या समाजाकि समरसता का भाव सबके लिए एक नायक की आवश्यकता होती है। व्यवस्था से हर इंसान परेशान होता है परंतु हर इन्सान में हिम्मत भी नहीं होती है कि उस व्यवस्था के खिलाफ खड़ा हो सके। उन तमाम करोड़ों लोगों की पीड़ा का वाहक कौन होगा? कौन इस पीड़ा से निजात दिलाएगा। हारा हुआ मन, देवता, अल्लाह, ईश्वर को गढ़लेता है। अपने कर्मों को लेकर रोता है पर समस्याओं के खिलाफ़ उठता नहीं है। कमोबेश हिन्दी साहित्य में भक्ति आंदोलन का यही कारण रहा था। हिटलर भले ही विश्व का एक भीषण खलनायक हो, लेकिन एक समय में एक समुदाय की मांग था वह। गांधी तो बेमिशाल नायक हैं ही, जिन्होंने हताश-निराश भारतीय जनता को नया सूरज लाकर दिया था स्वतंत्रता संग्राम के लिए।
ठीक उसी प्रकार से मेलूहा की जनता को तालाश है अपने समस्याओं से लड़ने वाले एक नायक की। एक शक्तिशाली योद्धा की। उनकी तालाश पूरी होती है कैलाश मानसरोवर के पास जाकर जहां नंदी ढंढ़ता है एक शिव नाम के कबाइली लड़ाके को। निरंतर लड़ाई से परेशान शिव एक नई दुनिया की तालाश में है जहां लोग आपसी मतभेद को  भूला कर परस्पर सहयोग के साथ रहे। वह अपने कबीले की भलाई के लिए उस जगह को छोड़कर निकल पड़ता है मेलूहा के लिए। 

        मेलूहा जो देखने में देवताओं की नगरी सा लगता है। उसकी रचना, उसकी भव्यता को देखकर शिव चकित रह जाता है परंतु इस भव्यता में भी एक डर छिपा हुआ है। सोमरस के खत्म हो जाने का भय। यह वह पेय पदार्थ है जिसे पीकर मेलूहा वासी सदियों तक अपने यौवन के साथ जीते हैं। इसी खत्म होते संसाधन एवं सभ्यता को बचाने के लिए उन्हें एक ऐसे नायक की तालाश है, जो मेलूहा का नहीं होगा जिसके कंठ का रंग नीला हो जाएगा सोमरस पीने के बाद। वही इनके समस्याओं को दूर कर सकता है। वही इनके सोमरस का रक्षण कर सकता है। इसी कारण से जैसे ही सोमरस पीने के बाद शिव के कंठ का रंग नीला हो जता है, सभी मेलूहा वासी उसे देवता मान बैठते हैं। वह साधारण एक कबीले का रहने वाला शिव जो तिब्बत से आते हुए चिन्तित था कि उसे  दूसरे नगरी में एक मजदूर की तरह जीना होगा यहां आते हीं अपने नीले कंठ के कारण महानायक बन जाता है।

        पौराणिक कथा से दूर वह शिव एक साधारण इन्सान की तरह ही जीता है, उसका भोलापन तबतक झलकता रहता है जबतक कि वह युद्ध के लिए उठ खड़ा नहीं हो जाता है। तबतक उसमें उन सभी दुर्बलताओं को दिखाया गया है, जो एक इन्सान में हो सकता है। वह सती को देखकर एकटक देखता ही रह जाता है। जब सती उससे बात करना शुरू करती है, तो शिव का स्वयं पर नियन्त्रण नहीं रहता है, वह भावातिरेक में सती को लड़ाई के लिए निमंत्रण तक दे डालता है। शिव आम लड़कों की तरह सती के पीछे जाता है, उसे नृत्य करना सिखाता है।

        दूसरी ओर मेलूहा के राजा शिव को अपनी ओर से चंद्रवंशियों के विरुद्ध लड़ाई के लिए तैयार करवाता है। लड़ाई का कोई स्पष्ट कारण नहीं है। यहां इस किताब में दूसरे पक्ष को कोई विशेष तव्जजो नहीं दी गई है। सिवाय ‘‘व्यक्तियों के द्विप’’ के। इस अध्याय में आकर पता चलता है कि जिसप्रकार मेलूहा के सूर्यवंशी किसी नीलकंठ का इन्तजार कर रहे थे ठीक उसी प्रकार चंद्रवंशी भी नीलकंठ का इन्तजार कर रहे थे, उनके दुश्मनों से बदला लेने के लिए। 
इसी अध्याय में दो सामाजिक संरचना पर लेखक बात करता है, जो ज्यादा रोचक है। एक व्यक्ति अपनी आदतों व्यवहारों को ही श्रेष्ठ मानता है, उससे इतर आचरण करने वाले व्यक्ति को वह खलनायक मानने लगता है। ठीक उसी प्रकार से मेलूहा और स्वद्वीप के शासन तंत्र में अंतर है। इसीकारण से दोनों स्वयं को श्रेष्ठ एवं दूसरे को खलनायक मानते हैं। मेलूहा में साम्यवादी शासन है, वहां हर कार्य के लिए नियम है जिससे बंध कर चलना वहां की जनता की जिम्मेदारी है। यहां तक की माता बच्चा भी उत्पन्न राष्ट्र के हित में करती है। जिसे वह मयका व्यवस्था कहते हैं। इसपर गर्व से कहते हुए दक्ष कहता है - ‘‘हमारा सम्राज्य अमीर है। अपने कर्तव्यों से भी अधिक बच्चे केवल एक विकल्प की वस्तु है।’’ इस प्रथा में माता अपने बच्चे को एक विशेष जगह पर जनम देकर चली आती है। बच्चों को उसी क्षण से राज्य के संरक्षण में रखा जाता है, एक ही तरह की शिक्षा दी जाती है और जिसे जो बनना होता है वह बनजाता है। इसी प्रकार से जनम देने वाली माता को अधिकार होता है कि बाद में वह अपनी स्वेच्छा से किसी भी कार्यकुशल बच्चे को गोद ले सकती है। 

        दूसरी तरफ है, स्वद्वीप नगर जहां लोकतंत्र है। जनता पर शासन का प्रभाव नहीं है, वहां के लोग अपनी स्वंतत्रता से जीते हैं, इस कारण से वहां पूंजीपतियों का सम्राज्य है। यह व्यवस्था सतही तौर पर देखने में बड़ा विडम्बनापूर्ण लगता है, सड़क की बदहाली, अस्वच्छता, जनसंख्या वृद्धि जैसे तत्व इस राज्य को और चिंतापूर्ण स्थिति में लाकर खड़ा कर देता है। फिर भी देवताओें की नगरी से ज्यादा यहां के जनता प्रसन्न हैं। यहां के लोंगो को स्वयं पर नाज़ है, स्वयं पर विश्वास है। यहां तक कि वहां का भीखारी भी अपने अस्तित्व के साथ जीता है, उसका भीख मांग कर खाना उसका गौरवपूर्ण कार्य है अनुदान पर जीने के मुकाबले। जिसका वर्णन करते हुए लेखक लिखता है:- ‘‘स्वतंत्रता। एक दयनीय के लिए प्रतिष्ठा की स्वतंत्रता। ऐसा कुछ जो मेलूहा की व्यवस्था के प्रशासन में असंभव है। ’’

        समग्रता में इस किताब को देखें तो व्यक्ति विशेष ही प्रकट होता है। पता नहीं क्यों कई विद्वानों ने इस किताब को पौराणिक धारणाओं से जोड़ा है। भारतीय पुराण व्यक्ति के उलट समाज की महत्व की व्याख्या करता है। इसमें राजशाही और व्यक्ति के महत्व को पूरी तरह से फिल्मी पटकथा प्रदान कियया गया है। इस पूरे किताब में किसी व्यक्ति का आत्मसंघर्ष प्रकट होकर नहीं आता है। शिव जो काम कर भी रहा है, वह प्रेम में नियंत्रित होकर करता है। शिव जैसा महान विभूति अगर कोई क्रांति निस्वार्थ भाव से ना कर व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए करता है, तो यह संदेहास्पद है। वैसे लेखक ने पूरी निष्ठा के साथ शिव की संवेदना को समाज के साथ जोड़ने का प्रयास किया है, लेकिन यह उसी प्रकार से है, जैसे किसी हिन्दी फिल्म का नायक तबतक उसी फिल्म के खलनायक को खलनायक नहीं मानता है, जबतक वह नायिका को परेशान नहीं करता है। इस उपन्यास में भी शिव और सती का प्रेम कुछ इसी फिल्मी अंदाज में शुरू होता है, सती पर कुछ लोग हमला करते हैं, जिनसे शिव  उनकी रक्षा करता है, और दोनों के बीच एक सुंदर संयोग शुरू हो जाता है। सती जोकि राजघराने से है, और मेलूहा के नियम के अनुसार वह विक्रम है। अर्थात एक ऐसी नारी जो कि ऐसी माता है, जिसने मृत शिशु को जनम दिया था, साथ ही वह विधवा है। वहां की मान्यता के अनुसार उसे जो कोई भी छूएगा वह नष्ट हो जाएगा। इसकारण से सती कुछ समय तक शिव से दूरी बनाकर रखती है। राजघराने की नायिका के लिए नियम भी बदले जा सकते हैं। यह कोई असंभव कार्य नहीं है। 
        किताब शुद्ध मनोरंजन के लिए है। मुझे कभी और कहीं भी इसका संदर्भ पौराणि नहीं लगा। जितने भी नायक को मैं जानता हूं अर्थात जिनके प्रत्यक्ष परिणाम हमारे पास है, उन्हें परिस्थिति ने महान नहीं बनाया, पहले उन्होंने परिस्थितिजन्य समाज की पीड़ा को अपनाया फिर उस पीड़ा से बचने की राह की ओर निकल पड़े। अकेले ही नहीं उन सभी को साथ लेकर जो उस पीड़ा से दुखी थे। महानायक कबीर हो या माहत्मागांधी। उनके दुखों में सदियों की संवेदना छुपी हुई है। वह पलायनवादी नहीं है। वह संवेदनशील है, पीड़ाओं को समझने और जानने वाले हैं उसके बाद उसकी समिक्षा करने वाले हैं। 

        जब इस किताब को पढ़रहा था,  उस वक्त ज़ेहन में हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की रचना ‘अनाम दास का पोथा’ भी चल रहा था, उसका नायक ‘रेक्व’ संसार की पीड़ा को दूर करने के लए जन के बीच जाता है, नाकि राजभवन की कन्या के प्रेम में पड़कर राजभवन में राजशाही आनंद को भोगता है। वह युद्ध भी नहीं करता, वह तो बस जीने का माध्यम ढंूढ़ताा है, जो सबके लिए हो। यदि अमीश शिव को अपने उपन्यास को महानायक बनाते हैं, तो उनके समक्ष होरी की क्या औकात होगी, जो बेचारा एक गाय खरीदने के चक्कर में ही पूर्णतया बर्बाद हो जाता है। 

        कुछ मूलभूत समस्याओं को छोड़कर यह किताब किसी व्यवस्थित समस्या की ओर ध्यान नहीं दिलाता है। आतंकवाद क्या है, उसकी एक छाया मात्र पुस्तक में है, असली स्वरूप उसका क्या है? वह क्यों है? इस ओर ध्यान दिलाने की आवश्यकता लेखक ने नहीं समझा है। शायद यह उनके लेखकीय व्यापार की चालाकी हो। जो स्पष्टतया दर्शाता है कि व्यक्ति यदि किसी प्रबंधन क्षेत्र से लेखन जगत में आया है, तो वह यहां भी व्यापारिक नीतियों की ओर अग्रसर है। इसलिए किताब ना तो कोई विचार मन पर छोड़ता है, और नाहि कोई प्रश्न ज़ेहन में उमड़ता है।
जासूसी और अपराध से संबंधित उपन्यास पढ़ने वाले पाठकों के लिए यह एक महत्वपूर्ण रचना हो सकती है, लेकिन साहित्यक पाठकों को इस किताब से कुछ निराशा ही हाथ लगेगी। इस किताब की बहाव में बहा जा सकता है, जैसे किसी हिन्दी फिल्म को देखकर हम उसके दृश्यों के साथ आत्मसात कर लेते हैं, लेकिन यह एक विचारवान पुस्तक नहीं है, जो जिन्दगी को एक नाया आयाम दे। ऐसा इसलिए है कि साहित्य में हर व्यक्ति स्वयं के जीवन का नायक है, उसकी पीड़ा उसके दुखों को दूर करने के लिए कोई भगवान, कोई महानायक नहीं आने वाला है। ‘धर्मवीर भारती’ ने तो अपने नाटक ‘अंधा युग’ में भगवान की हत्या तक कर डाली थी। ऐसे में किसी किताब का यह कहना कोई महानायक है, जो पृथ्वी पर आता है बुराई को नाश करने के लिए, तो किताब मनुष्य को दिगभ्रमित ही करता है। ऐसी पुस्तक भारतीय सभ्यता को फिर से उसी दौड़ में ले जाने का प्रयास करती है जहां से हम निकले हैं। जिसमें राम ही मर्यादा पुरूषोत्म थे। जहां सबकुछ करने अधिकार कृष्ण को ही था। राजशाही परिवार ही नीति निर्धारक थे। वही युद्ध कर धर्म और अधर्म का निर्णय ले सकते थे। विचारों की गहराई में जाकर देखें तो लड़ाई के माध्यम से धर्म और अधर्म का निर्णय कहां तक लिया जा सकता है। वैसे छिटपुट तौर पर लेखक ने यह समझाने का प्रयास किया है, ना तो कोई देवता होता है, और नाहि कोई दानव, लेकिन दैवीय गुण के आधार मात्र पर किसी को नायक बना देना उनके इस कथन को बौना साबित कर देता है। वैसे बहुत बार लेखक ने बचने का प्रयास किया है, इस कारण से चंद्रवंशियों को भ्रम की स्थिति में रखा है जिससे पाठक सहजता से अनुमान ना लगा सके कि वह क्या हैं। वह दुष्ट प्रजातियों का समागम है, या एक अच्छी संस्कृति। लेखक की दिलचस्पी और सहानुभूति मेलूहा वासियों की ओर विशेष रहा है। 

        मेरे लिए इस किताब का शिव कुछ रजनीकांत टाईप शिव ही हैं, और इसे मैं किसी पौराणिक शिव के साथ जोड़ने की भूल नहीं कर सकता। वैसे मेरी सलाह माने तो इस किताब को तो एक बार पढ़ा ही जा सकता है। लेखक की पहली रचना है, जिसमें उसने मिथकीय तत्व को अपने अनुसार तोड़ने का भरसक प्रयास किया है, लेकिन उन्होंने उस मिथ को तोड़कर एक अपना नया मिथ गढ़ डाला है। वैसे जब भी आप इस किताब को पढ़ें एक हिन्दी फिल्म की पटकथा के तौर पर ही पढ़े इसका कोई धार्मिक और सांस्कृतिक पहलू ज़ेहन में लाएं तभी आप इसको स्वच्छंदता के साथ पढ़ सकते हैं। 


जितेंद्र कुमार झा 
उत्तरकाशी, उत्तराखंड

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