आशा



आहा ! आज मोगरा खिला है
कैसा सफेद शांत कोमल है ।
नन्हा पौधा रौपा था जब
एक आशा भी रौपी थी साथ
कल ये बड़ा मजबूत होगा
हरियाली की छटा बिखरेगी
हर रोज कोपलें फूटेंगी नयी
हर सुबह सीचा निर्मल जल से
उगते सूरज की नन्ही किरणों से
दिन सप्ताह महिना फिर साल हुआ
न आयी कली, न ही फूल खिला
हर सुबह देखती आशानवित होकर
फुनगा फुटेगा नन्ही कली आयेगी
हर दिन होती परंतु निराश
लेकिन आशा की डोर नहीं टूटी थी
सींचती थी हर दिन उसी आशा के साथ
आज नहीं तो कल मोगरा फूलेगा
मेरी आशाओं का मोगरा फूलेगा
कल देखा एक नन्हा फुनगा फूटा है
तीन दिन में कली बन गया है
आज जो देखा मोगरा महक रहा है
उज्जवल श्वेत वर्ण मुस्कुरा रहा है
मैने छुआ अंतर मन तक महक रहा है
आज आशा भर पायी है
आज एक है कल दो होगे
फिर एक नई आशा का जन्म हुआ है
फिर एक प्रतिक्षा यही है जीवन यही है
आशा कर्म प्रतिक्षा अंत में फल
यही है जीवन का शाश्वत सत्य
निरंतर ........ निरंतर ........ निरंतर

अफसाना अन्जुम

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