ग़ज़ल- लाख दुनिया भर का कर लो तुम सफ़र अनमोल जी

लाख दुनिया भर का कर लो तुम सफ़र अनमोल जी
पर सुकूं देता है बस अपना ही घर अनमोल जी

हर क़दम पर हादसों का डर सताता है यहाँ
ज़िंदगी है हाइवे का इक सफ़र अनमोल जी

फ़ूल, ख़ुशबू, तितलियाँ कुछ भी नहीं हैं बाग़ में
अब ख़िजाँ का हो रहा है यां असर अनमोल जी

हर किसी को मश्विरा देना मगर ये सोचकर
चीटियों तक के निकल आते हैं पर अनमोल जी

नापकर हम आ चुके हैं उस समंदर की हदें
पार होते हैं जहाँ पर डूबकर अनमोल जी

इस तरफ गोली चली है, खूं बहा, दंगे छिड़े
हाल क्या है आप बतलाना उधर अनमोल जी

के. पी. अनमोल
वेब पत्रिका ‘हस्ताक्षर’ में प्रधान संपादक

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