रात ख़्वाब में तुम आये थे

रात ख़्वाब में तुम आये थे
बैठे थे सिरहाने मेरे
आहिस्ता सहलाते मेरे बालों को
बोसा देते गीत मधुर सा गाते थे
नर्म-सुफ़ैद रौशनी लेकर
चाँद ज़मीं पर आया था,
आँख खुली तो सिरहाना भी सूना था
बेतरतीब पड़े बिखरे थे बाल मेरे
और ज़बीं पे तपिश डालती किरणें थीं
आफ़ताब ने ख़्वाब जला डाला सारा
काश...न आँखें खुलती तो अच्छा होता
रात ख़्वाब में तुम आये थे....

दीपक शर्मा ‘दीप’
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

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