ग़ज़ल- पीर ढो रही पल-पल, धरती रोती है

पीर ढो रही पल-पल, धरती रोती है। 
नीर खो रही जल-जल, धरती रोती है। 

डेरा डाले, ठाठ-बाठ से, बागों में 
हँसते हैं जब मरु-थल, धरती रोती है। 

भरी बोतलों को, जब सूने नैन उठा 
तकते हैं घट निर्जल, धरती रोती है।     

जाने कब फिर गले मिलें, पर्वत-झरने    
सोच-सोच कर बेकल, धरती रोती है।  

पूछा करते, सून पोखरों से जब वे 
कहाँ जाएँ हम शतदल, धरती रोती है। 

जब-जब नज़र आता उसको सावन में भी  
अपना निचुड़ा आँचल, धरती रोती है।  

सोच-सोच है चिंतातुर, कैसे सँवरे   
नई पौध का अब कल, धरती रोती है।  

लौट आए मुस्कान उसकी, यदि सब ढूँढें   
अब भी ‘कल्पना’ कुछ हल, धरती रोती है।  

कल्पना रामानी 
ईमेल -kalpanasramani@gmail.com

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