मेरी गुड़िया


मेरी गुडि़या तुम आ जाती एक बार
धूल जाता मेरे जीवन से गमों का भार
मैं भी तुम संग बच्ची बन जाती
बचपन को पिफर मैं अपने वापस बुलाती
तुम आ जाती एक बार मेरी गुडि़या
तुम आ जाती एक बार
प्रश्नचिह्न लगा है आस्तित्व पर मेरे बेटी
मातृत्व मेरा चित्कार कर रहा है
तुझे पाने की गुहार कर रहा है
नहीं सहे जाते मेरी गुडि़या
इस दुनिया के ताने अब
बिन अपराध् के मैं सजा काट रही हूँ
अपना दुख नहीं किसी से बाँट रही हूँ
किससे कहूँ कोई नहीं समझेगा मेरी व्यथा
इसलिए नहीं कहती हूँ किसी से मैं अपनी कथा
तुम जब आओगी मेरे आंगन में
तुमसे बाँचूगी मैं अपना सुख-दुख
जो बरसों से समाहित हैं मेरे भीतर
निकल जायेगा मेरे जीवन से वो सारा विषाद
तुम आ जाओ एक बार मेरी गुडि़या
तुम आ जाओ एक बार।

आशा रौतेला मेहरा

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